बंगाली समाज में दुर्गा पूजा ( Durga Puja) का बहुत महत्वपूर्ण स्थान होता है। शक्ति के महान रूप में रूप में देवी दुर्गा को बंगाली समाज में पूजा जाता है।

माता के द्वारा महिषासुर से युद्ध एवं वध करके संसार को आसुरी शक्तियों से मुक्ति दिलाने की ख़ुशी में मनाया जाता है। इस उत्सव का आरम्भ महालया नवरात्री (Navratri) के पहले दिन से होता है।  

शारदीय नवरात्र की धूम पूरे भारत वर्ष में होती है। परन्तु  बंगाल के लिए दुर्गा की आराधना से बड़ा कोई उत्सव नहीं है। पूरा बंगाल देवी दुर्गा की भक्ति के रंग में रंग जाता है।

यदि आप बंगाल की संस्कृति को करीब से देखना और समझना चाहते है, तो इस उत्सव के समय ही कोलकोता जाये।

वे देश-विदेश जहां कहीं भी रहें, इस पर्व को खास बनाने में वे कोई कसर नहीं छोड़ते। ऐसे में इस प्रश्न का मन में आना बहुत स्वाभाविक होता है।

बंगाल में दुर्गा पूजा के महत्व के पीछे ऐसी कौनसी घटना है? जिसके कारण दुर्गा पूजा इतनी  प्रसिद्ध है?

The Begining of Durga Puja | दुर्गा पूजा का आरंभ

दुर्गा पूजा का आरम्भ 1757 में हुए प्लासी युद्ध से भी जोड़कर देखा जाता है। इससे सम्बंधित पेंटिंग राजा नव कृष्णदेव के महल में भी लगी थी।

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प्लासी युद्ध में विजय के बाद एस्ट इंडिया कंपनी के रॉबर्ट क्लाइव भारत में पहली विजय के लिए ईश्वर के आभार स्वरूप उत्सव मानना चाहते थे।

परन्तु बंगाल के शासक नवाब सिराजुद्दौला ने युद्ध में हार से पहले ही सारे चर्च तुड़वा दिए थे। तभी राजा नव कृष्णदेव ने इस उत्सव का भार अपने ऊपर लिया।

महान चित्रकारों और मूर्तिकारों को बुलाया गया एवं भव्य देवी प्रतिमाओं का निर्माण किया गया। इस तरह कोलकाता को भव्य रूप से सजाया गया।

यह सब बंगाल के कोने कोने से आये आये जमींदारों अवं अन्य समृद्ध लोगो ने भी देखा और अपने अपने गृह नगर में अपनी प्रतिष्ठा को दिखने के लिए इस उत्सव की पुनरावृत्ति वर्ष करने लगे।

1757 के बाद 1790 में राजाओं, सामंतों और जमींदारों ने पहली बार बंगाल के नदिया जनपद के गुप्ती पाढ़ा में सार्वजनिक दुर्गा पूजा का आयोजन किया था।

इसके बाद दुर्गा पूजा सामान्य जनजीवन में भी लोकप्रिय होती गई और इसे भव्य तरीके से मनाने की परंपरा पड़ गई। Ref. News18

एक अन्य मत के अनुसार इसे नवी शताब्दी से भी जोड़कर देखा जाता है। एक कहानी में रघुनंदन भट्टाचार्य नाम के एक विद्वान के पहली बार दुर्गा पूजा आयोजित करने का अस्पष्ट वर्णन भी मिलता है।

इसी प्रकार ताहिरपुर के जमींदार द्वारा पंडित कुल्लक भट्ट के निर्देशन में पारिवारिक रूप से दुर्गा पूजा मानाने का भी उल्लेख मिलता है।

माना जाता है की दुर्गा पूजा को बंगाल में प्रसिद्ध करने एवं इसके वर्तमान स्वरूप तक लाने में पॉल एवं सेनवंशियो का विशेष योगदान है।

Mythical Stories of Durga Puja | दुर्गा पूजा के पौराणिक मत

देवी दुर्गा का दूसरा नाम गौरी भी है, जिसकी आराधना दुर्गापूजा में अश्टमी के दिन की जाती है। कहा जाता है, कि पुरातन काल में दुर्गम नाम का एक अत्यंत बलशाली दानव हुआ  करता था।

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उसने ब्रह्मा जी को अपनी तपस्या से प्रसन्न करके सारे वेदों को अपने अधिकार में कर लिया था। जिसकी वजह से सभी देवताओं का बल क्षीण हो गया था।

दुर्गम ने अपने बल और शक्ति से स्वर्ग पर अधिकार कर लिया और सभी देवताओं को स्वर्ग से बहार कर दिया। 

तब सभी देवताओं ने एकत्रित होकर अदि शक्ति का आव्हान किया और उनको अपनी व्यथा कथा सुनाई और देवी ने उनको उक्त दानव से मुक्ति दिलवाने की बात कही।

देवी माँ ने दुर्गम के विनाश का प्रण लिया जब ये बात दुर्गम को पता चली, तो उसने पुनः स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया।

तब देवी ने दुर्गम की सेना का संहार किया और अंत में दुर्गम का भी वध किया। माँ भगवती नें दुर्गम के साथ जब अंतिम युद्ध किया।

तब उन्होने भुवनेश्वरी, काली, तारा, छीन्नमस्ता, भैरवी, बगला तथा दूसरी अन्य महा शक्तियों का आह्वान कर के उनकी सहायता से दुर्गम को पराजित किया था।

इस महा युद्ध में दुर्गम का वध करने के कारन देवी भगवती का नाम दुर्गा पड़ा। एक अन्य मत में देवी द्वारा देवताओ का अभिमान तोड़ने हेतु शक्ति पुंज रूप धारण करने की कथा भी प्रचलित है।

एक बार देवताओं और दानवों के बीच बहुत बड़ा युद्ध हुआ। बहुत बड़े रक्त संघार के उपरांत देवताओं की विजय हुई। 

इस विजय के कारण देवताओं का मस्तिष्क घमंड से भर गया, और वह स्वयं को सर्वोच्च मानने लगे। तब देवताओं के घमंड को नाश करने के लिए देवी दुर्गा ने तेज पुंज का रूप धारण किया और देवताओं के समक्ष  प्रकट हुई। 

देवी के विराट रूप को देखकर देवता गण अत्यंत भयभीत हो गए, और सभी ने देवताओं के राजा  इंद्र ने वरुण देव को इस तेज पुंज का रहस्य जानने के लिए भेजा।  

वरुण देवता ने प्रकाश पुंज रुपी माँ दुर्गा के समक्ष अपनी प्रशंसा का बखान करना शुरू कर दिया और देवी से उनका परिचय मांगने लगे।

तब तेज पुंज रुपी देवी ने वरुण देवता के सामने एक तिनका रखा और कहा की यदि तुम इतने बलशाली हो तो इस तिनके को उड़ाकर दिखाओ।  

वरुण देव ने एड़ी चोटी का ज़ोर लगा लिया, परन्तु उस तिनके को टस से मस न कर सके।

हार कर वरुण देव निराश और हताश अपने टूटे हुए घमंड के साथ वापस इंद्र देवता की शरण में लोटे और उनको सारी व्यथा कथा सुनाई। 

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इसके उपरांत इंद्र देव ने अग्नि देव को वहां भेजा। तब तेज पुंज ने अग्नि देव से भी कहा की आप अपनी शक्ति से इस तिनके को भस्म करके दिखाओ। 

परन्तु अग्नि देव भी उस तिनके का कुछ न कर सके। अपना सा मुहं लेकर इंद्र देव के सामने उपस्थित हुए और सारि कथा सुनाई। 

आखिरी में सभी देवतागण  तेज पुंज के समक्ष उपस्थित हुए और उसकी आराधना करना शुरू किया। तब माता दुर्गा अपने वास्तविक रूप में प्रगट हुई और देवताओं को यह ज्ञान दिया की माँ शक्ति के आशीष से आप सब नें दानवों को परास्त किया है।

तब देवताओं नें भी अपनी गलती के लिए क्षमा मांगी और अपना मिथ्या अभिमान त्याग दिया। देवी की स्तुति गान किया।

Rituals on Durga Puja | दुर्गा पूजा के संस्कार

महोत्सव हिन्दू देवी माता दुर्गा की पूजा पर आधारित होता है। जिन्हें उनके चार बच्चों कार्तिक, गणेश, लक्ष्मी और सरस्वती के साथ 10 भुजाओं वाली देवी के रूप में पूजा जाता है।

माँ भगवती दुर्गा को 10 भुजाओं के साथ सिंह पर सवार होकर महिसासुर का वध करते हुए दर्शाया जाता है, और इसी रूप की पूजा पूरे भारत वर्ष केअलावा विदेशों तक में की जाती है।

पूजा परिजनों से मिलने का और बंगाली समाज के लोगों की सांस्कृतिक विरासत को सहेजने, सराहने और उसे समझने का भी समय होता है।

पंडालों में दुर्गा की प्रतिमा महिसासुर का वद्ध करते हुए बनाई जाती है। दुर्गा के साथ अन्य देवी-देवाताओं की प्रतिमाएं भी बनाई जाती हैं। उस पूरे नमूने को चाला कहा जाता है।

इस चाल में दुर्गा के चरणों में होता है असुर महिसासुर, साथ ही उनका वाहन शेर। इसके साथ ही दाईं ओर सरस्वती और कार्तिकेय की प्रतिमा होती हैं ।

वहीं बाई लक्ष्मी और गणेश की प्रतिमा होती हैं। वहीं गणेश के बगल में उनकी पत्नी के प्रतीक के तौर पर दो केले की लटे रखी जाती है। वहीं चाल पर शिव की प्रतिमा या तस्वीर भी बनाई जाती है।

Chokkhu Daan | चोखूदान

यह परंपरा भी प्राचीन समय से चली आ रही है। चोखूदान देवी को आँखों की भेट करना। संपूर्ण चाला बनाने में 3 से 4 महीने का समय लगता है।

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परन्तु देवी की आँखे सबसे आखरी में सबसे वरिष्ठ कारीगर द्वारा ही एकांत में बनाई जाती है। इसके बाद चाला यजमान को सौप दिया जाता है।

Do Puja | दो पूजा

दुर्गा पूजा को दो भागो में बाटा जा सकता है। वैसे तो यह उत्सव हिमालया से आरम्भ हो जाता है। पहले दिन से पंचमी तक पूजा घरो में की जाती है। उसके पश्चात षष्ठी से पंडालों में सार्वजानिक रूप से करते है।

इस दोनों ही तरह की पूजा में रीति-रिवाज के अलावा सब कुछ बिल्कुल अलग होता है। दो अलग अलग दुर्गा पूजा से अर्थ है, एक जो बहुत बड़े स्तर पर दुर्गा पूजा मनाई जाती है, जिसे पारा कहा जाता है।

और दूसरा बारिर जो घर में मानाई जाती है। पारा का आयोजन पंडालों और बड़े-बड़े सामुदायिक केंद्रों में किया जाता है। वहीं दूसरा बारिर का आयोजन कोलकाता के उत्तर और दक्षिण के क्षेत्रों में किया जाता है।

Ashtami Pushpanjali | अष्टमी पुष्पांजलि

यह त्योहार के आठवें दिन बनाया जाता है. इस दिन सभी लोग दुर्गा को फूल अर्पित करते हैं। कहा जाता है, कि इस दिन सभी बंगाली दुर्गा को पुष्पांजलि अर्पित करते हैं।

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वह चाहे किसी भी कोने में रहे, पर अष्टमी के दिन सुबह सुबह उठ कर दुर्गा को फूल जरूर अर्पित करते हैं, उस देवी को जिसे वह मां मानते हैं।

Kumari Pooja | कुमारी पूजा

पूजा का यह रूप भी संपूर्ण बंगाल में काफी प्रसिद्द है। कुमारी पूजा में 1 से 16 वर्ष की बालिकाओ को देवी रूप मानकर पूजा की जाती है।

बेलूर मठ, हावड़ा में की जाने वाली पूजा सबसे प्रसिद्ध कुमारी पूजन में से एक है।

Sandhya Aarti | संध्या आरती

दुर्गा पूजा में भारतीय घड़ी के अनुसार समय को नहीं माना जाता है। मतलब यह कि पूजा के दौरान एक से दूसरा दिन शाम को पूजा के दौरान बदलता है।

संध्या आरती की रौनक इतनी चकाचौंध और खूबसूरत होती है, कि लोग इसे देखने दूर-दूर से कलकत्ता पहुंचते हैं।

पारंपरिक कपड़ों में सजे धजे लोग इस पूजा की रौनक और बढ़ा देते हैं। चारों ओर उत्सव का माहौल पूरे वातावरण में नई रौनक डाल देता है।

संगीत, ढोल, घंटियों और नाच गाने के बीच सांधा आरती की रसम पूरी की जाती है। यह नौ दिनों तक चलने वाले त्योहार के दौरान रोज शाम को की जाती है।

साथ ही इसी दौरान दधिची नाच भी होता है। दुर्गा पूजा के दौरान होने वाली प्रत्येक प्रथा का समान महत्तव होता है।

Sindur Khela | सिंदूर खेला

दसमी, एक ऐसा शब्द जो हर बंगाली को थोड़ा उदास कर देता है। यह पूजा का आखिरी दिन होता है।

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पूजा के आखिरी दिन महिलाएं सिंदूर खेला खेलती हैं। इसमें वह एक दूसरे पर सिंदूर से एक दूसरे को रंग लगाती हैं, और इसी के साथ अंत होता है। इस पूरे उत्सव का, जिसकी तैयारी महीनों पहले शुरू हो जाती हैं।

Vijay Dashmi | विजय दश्मी

इस दिन बंगाल की सड़के बिल्कुल गायब हो जाती हैं, और हर तरफ केवल भीड़ ही भीड़ दिखती है। यह त्योहार का आखिरी दिन होता है।

दुर्गा की मूर्ति का विसर्जन किया जाता है, और इस तरह वह हिमाजय में अपने परिवार के पास वापस लौट जाती हैं। इस दिन पूजा करने वाले सभी लोग एक दूसरे के घर जाते हैं. शूभकामनाएं और मिठाईयां देते हैं।

पूजा के दौरान की जाने वाली सभी प्रथाओं, रीति रिवाजों का महत्व आज के समय में बढ़ गया है। इसका प्रमुख कारण है, कि लोग अपने परिवारों और संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं।

ऐसे में यह त्योहार ही है, जो हमें एक दूसरे के करीब लाते हैं। सालों से मानाए जाने वाले इस त्योहार के बारे में जितना जाना जाए उतना ही कम है। 

जिनका आनंद आप इस उत्सव का हिस्सा हो कर ही उठा सकते हैं। इन सबसे भी महत्वपूर्ण सबसे जरूरी बात यह है, कि यह त्योहार स्त्रीत्व का उत्सव है। यह उत्सव है, शक्ति के अन्नय और असीमित स्त्रोत मां दुर्गा का। 

तो देखा आपने एक ही त्यौहार के भारत में कितने रंग है। सबकी अलग अलग मान्यताये एवं रिवाज है। कही नवरात्री से गरबा (Garba) की धूम है, तो कही राम लीला।

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Why do we celebrate Durga Puja?

Durga Puja | दुर्गा पूजा देवी द्वारा प्रदान की गयी शक्ति अवं समृद्धि के लिए कृतघनता व्यक्त करने का उत्सव है।

Who started Durga Puja?

नवी शताब्दी में रघुनंदन भट्टाचार्य अवं १७५७ में राजा नव कृष्णदेव को Durga Puja | दुर्गा पूजा आरम्भ करने का श्रेय दिया जाता है।

What is the difference between Navratri and Durga Puja?

नवरात्री में माता के शक्ति रूपों की आराधना के लिए उपवास एवं तप को प्राथमिकता दी जाती है वही दुर्गा पूजा देवी द्वारा महिषासुर के वध का उत्सव है।
नवरात्री में त्याग तप के कारन मॉस मछली आदि तामस आहार का निषेध होता है वही Durga Puja | दुर्गा पूजा में इनके पारम्परिक व्यंजन बनाये जाते है।
नवरात्री में राम लीला का आयोजन होता है जो विजय दशमी पर रावण दहन से पूर्ण होता है। परन्तु दुर्गा पूजा में केवल देवी आराधना करते है और अंतिम दिन गुलाल खेल कर ख़ुशी व्यक्त करते है।

Which state is famous for Durga Puja?

सम्पूर्ण बंगाल दुर्गा पूजा के लिए जाना जाता है हलाकि बांग्लादेश, उड़ीसा, बिहार एवं नेपाल के कुछ हिस्सों में भी मनाया जाता है।

What is Durga Puja Pandal?

षष्टी से दुर्गा पूजा सार्वजनिक रूप से आयोजित की जाती है। इसके लिए विशेष स्थान बनाये जाते है जहा देवी प्रतिमा स्थापित की जाती है और सजाया जाता है। इस स्थान को पंडाल कहते है।

What Durga means?

दुर्गा शक्ति स्वरुप माता का ही एक नाम है जो दुर्गम नामक असुर का वध करने के बाद पड़ा।