भारत में मनाये जाने वाले उत्सवों की श्रंखला में सबसे प्रमुखता से मनाया जाने वाला त्यौहार या उत्सव है कृष्ण जन्माष्टमी (Krishna Janmashtami)। 

भारत के हिन्दू मान्यता में विश्वास करने वाले इस उत्सव को भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। 

कृष्ण जन्माष्टमी  के इस महोत्सव को गोकुलाष्टमी के रूप में भी जाना जाता है। किंवदंतियों के अनुसार देवकी के आठवें पुत्र, भगवान कृष्ण का जन्म भाद्रपद (अगस्त-सितंबर) महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को हुआ था। 

ऐसा माना जाता है कि जन्माष्टमी के शुभ दिन भगवान विष्णु ने भगवान कृष्ण के रूप में अवतार लिया था। कंस के अत्याचारों से अपनी प्रजा को न्याय दिलाने के लिए भगवान ने मानव अवतार लिया। 

Krishna Janmashtami Rituals | जन्माष्टमी के संस्कार   

जन्माष्टमी का उत्सव के दौरान भक्तगण कुछ नियमों का पालन सालों-साल से करते आ रहे हैं। इनका पालन करना ये लोग अपना परम् कर्तव्य समझते हैं। 

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उपवास रखना

जन्माष्टमी के दिन सभी कृष्ण भक्त सुबह से मध्यरात्रि कृष्ण जन्म के समय तक पूरी भक्ति एवं श्रद्धा से उपवास रखते है। 

अर्धरात्रि में बाल-गोपाल का पूजन

इस दिन आधी रत को कृष्ण जन्म के मुहूर्त अनुसार समय होने पर सभी भक्त या तो मंदिरों में सार्वजनिक रूप से या अपने निज स्थानों पर बल गोपाल की पूजा करते हैं। 

इस विधि का पालन करना इनके लिए परम् कर्तव्य होता है। कोई भी भक्त बिना पूजन के प्रसाद या भोजन ग्रहन नहीं करते। 

कृष्ण मंदिर के दर्शन करना

भक्तों द्वारा बिना भूले कृष्ण भगवान के मंदिरों का दर्शन करना इस उत्सव का सबसे ज़रूरी हिस्सा होता है। 

इसी कारण इस दिन सभी जगह कृष्ण जी के मंदिरों को सजाया जाता है। इनकी भव्यता इस दौरान देखते ही बनती है। 

विभिन्न मिष्ठान एवं पकवान बनाना

इस त्यौहार का आनंद लेने के लिए लोग अपने घरों में तथा मंदिरों में प्रसाद के स्वरूप में अलग-अलग प्रकार के मिष्ठान बनाते है।

विशेष रूप से इनमें दूध से बनी मिठाइयां अत्यंत महत्वपूर्ण होती हैं। इसके अलावा शक्कर का पाक जिसमे कई प्रकार के मेवे डाले जाते हैं बनाना सबसे ज़रूरी माना जाता है। 

इसके अलावा पंजीरी भी इस त्योहार पर बनने वाला सबसे मुख्य पकवान होता है। इसको गेहूं के आटे को शुद्ध घी में भूनकर बनाया जाता है,जिसमे विभिन्न फल डाले जाते हैं। 

जन्माष्टमी पूजन विधि 

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन पूरे संसार में जहाँ भी उनके भक्त है उनके द्वारा भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप की आराधना की जाती है।  

उनके बाल स्वरूप के रूप में बाल गोपाल की चांदी, तांबा, पीतल, वृक्ष, मिट्टी या चित्ररूप की मूर्ति पूजा के लिए स्थापित की जाती हैं।

बाल गोपाल की पूजा के लिए आप हमेशा पूर्व या उत्तर दिशा में बैठें। फिर हाथ में जल, पुष्प एवं अक्षत् लेकर मंत्र से संकल्प लें।

ममखिलपापप्रशमनपूर्वक सर्वाभीष्ट सिद्धये।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रतमहं करिष्ये॥

इस दिन  दोपहर के समय देवकी जी के लिए सुंदर ‘सूतिकागृह’ का निर्माण करें। इसमें बाल गोपाल के लिए सुंदर बिछौने की व्यवस्था करें तथा  वहीं पर शुभ कलश की स्थापना करें। 

इसके बाद रात्रि में श्रीकृष्ण जन्म का मुहूर्त के अनुसार विधि विधान से बाल गोपाल के प्रकट होने की कल्पना कर उनकी पूजा करें, इस दौरान देवकी तथा वासुदेव की भी पूजा करें।

पूजन के दौरान आप  ‘धर्माय धर्मेश्वराय धर्मपतये धर्मसम्भवाय गोविन्दाय नमो नम:।’ का जाप करें और इस मंत्र को बोलते हुए ही श्रीकृष्ण जी को पुष्प अर्पित करें।

पूजन के दौरान आपको बाल-गोपाल की मूर्ति को पंचामृत से स्नान करना चाहिए। पंचामृत स्नान मंत्र ” पंचामृतं मयानीतं पयोदधि घृतं मधु। शर्करा च समायुक्तं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम्।।”  का जाप करना चाहिए। 

इस मन्त्र को इस दौरान उच्चरित करने से पूजा का महत्त्व एवं फल बढ़ जाता है। अतः आपके लिए यह क्रिया अत्यंत आवश्यक हो जाती है। 

जन्माष्टमी व्रत एवं पूजा के बाद पारण करके व्रत को पूरा करना होता है। कुछ स्थानों पर लोग जन्माष्टमी पूजा के बाद पारण करते हैं, तो वहीं कुछ लोग नवमी के दिन पारण क्रिया संपन्न करते हैं।

गणेश उत्सव (ganesh chaturthi), दुर्गा पूजा (Durga Puja), नवरात्री (navratri) और गरबा (garba) की भी चमक धमक देखने लायक होती है। अधिक जानने के लिए उपरोक्त लिंक पर क्लीक करे एवं सम्पूर्ण विवरण प्राप्त करे।

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जन्माष्टमी का इतिहास एवं महत्व

हिंदू ग्रंथों के अनुसार भगवान कृष्ण इस दिन भगवान विष्णु के आठवें अवतार और बुराई के विनाशक के रूप में इस दुनिया में अवतरित हुए थे। 

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भगवद गीता एवं भागवत पुराण सहित प्राचीन हिंदू साहित्य स्पष्ट रूप से भगवान कृष्ण के जन्म की कहानी बताते हैं कि उनके मामा, राजा कंस उन्हें कैसे मारना चाहते थे। 

किस प्रकार श्री कृष्ण का जन्म तमाम बाधाओं को एक तरफ़ा करते हुए मथुरा के कारागार में हुआ तथा किस प्रकर उनके पिता वासुदेव ने उनको नन्द एवं यशोदा के घर तक पहुँचाया। 

उफनती यमुना नदी को पार करते हुए वासुदेव कृष्ण को नन्द एवं यशोदा के द्वार तक पहुँचाने गए, ताकि उनको कंस के क्रोध से बचाया जा सके। 

लोग इस त्योहार को बुराई पर अच्छाई  की जीत के रूप में भी मनाते हैं, क्योंकि श्री कृष्ण ही आगे चलकर महाभारत के युद्ध में पांडवों के सहायक बने तथा कौरवों का विनाश किया। 

भगवद-गीता के श्लोक में कहा गया हैं, कि जब भी बुराई की प्रधानता होगी एवं धर्म का पतन होगा, मैं बुराई को मारने और अच्छे को बचाने के लिए अवतार लूंगा।

जन्माष्टमी का मुख्य महत्व सद्धभावना को प्रोत्साहित करना एवं बुराई  को हतोत्साहित करना है। कृष्ण जयंती का पवित्र अवसर लोगों को एक साथ लाता है, इस प्रकार यह एकता और विश्वास का प्रतीक भी बन जाता है।

भगवान कृष्ण के जन्मदिन को अत्यंत उत्साह एवं सम्मान के साथ मनाने के लिए पूरा देश एक दुसरे के साथ आता है। 

बच्चों को छोटे कृष्ण के रूप में तैयार किया जाता है। मिठाई की दुकानों पर स्वादिष्ट मिष्ठान मिलते हैं और सुंदर हांडी के साथ बाजारों में दही हांड़ी की तैयारी की जाती है। 

कृष्ण जन्म से संबंधित नाटकों की तैयारी की जाती है तथा मंदिरों को फूलों से सजाया संवारा जाता है। इस दिन मंदिरों में पवित्र पुस्तकों, भागवत पुराण और भगवद गीता के छंदों का पाठ भी आयोजित किया जाता है।

पूरे देश में मनाये जाने वाले कृष्ण जन्मोत्सव समारोह मंत्रमुग्ध कर देने वाले होते हैं। भारत में कुछ स्थान के समारोह विशेष उल्लेख के पात्र हैं। 

मथुरा- वृंदावन का जन्माष्टमी महोत्सव 

श्री कृष्ण के बचपन से जुड़े तीन स्थान मथुरा, गोकुल एवं वृंदावन भारत में उत्तर प्रदेश प्रान्त के अत्यंत प्रसिद्ध एवं तीर्थ स्थान के रूप में सम्मानीय महत्व रखते हैं। 

ये तीनों स्थान इस उत्सव को मनाने के लिए उन लोगों के पसंदीदा स्थान हैं, जो घर से दूर जन्माष्टमी मनाने की योजना बनाते हैं। 

भगवान कृष्ण की जन्मस्थली मथुरा में उन्हें समर्पित लगभग 400 मंदिर हैं, जिनमें से सभी को इस दौरान खूबसूरती से सजाया जाता है।

इन तीनों स्थानों पर कृष्ण भगवान का स्वागत करने के कुछ सामान्य तरीके हैं, जैसे श्लोकों का जाप, रास लीला, आतिशबाजी एवं झूलोत्सव। कृष्ण जन्म दिवस से लगभग 10 दिन पहले यह उत्सव प्रारम्भ हो जाता है।

सभी भक्तगण कृष्ण भक्ति में लीन होकर मंदिरों के दर्शनार्थ निकलते हैं, अलग-अलग कृष्ण जन्म से संबंधित नाटिकाओं का आनंद लेते हैं। 

इस उत्सव के दौरान इन तीनों स्थानों की छवि देखते ही बनती है, चहुँ ओर लोग अपने आराध्य के अवतरण की खुशियां मनाते है।

उडुपी, कर्नाटक का कृष्ण जन्मोत्सव 

भारत का दक्षिणी क्षेत्र भी जन्माष्टमी के दौरान उत्सव के माहौल का आन्नद लेते हुए कृष्ण भक्ति में पूरी तरह डूब  जाता है।

कर्नाटक के उडुपी शहर में स्थानीय लोगों द्वारा विट्ठल पिंडी (या रास लीला) नामक नृत्य-नाटक कार्यक्रम का प्रदर्शन किया जाता है। 

भगवान कृष्ण की मूर्ति को विराजित कर एक रथ पूरे शहर की परिक्रमा लगता है। रथ पर गुपुर सजे होते हैं, इन गोपुरों पर दही (दही हांडी) से भरे मिट्टी के बर्तनों को गोपुरों पर लटका दिया जाता है। 

कृष्ण भक्ति की मस्ती में डूबे हुए भक्त इन गुपुरों पर लटकी दही हांडियों को तोड़कर अपने अंदर की ख़ुशी को ज़ाहिर करते हैं। 

उत्सव के दौरान हुली वेशा नर्तक भी एक बड़ा आकर्षण होते हैं, इसके अलावा स्थानीय प्रतियोगिताओं में जातीय वेशभूषा में सजे लोगों की साज-सज्जा की अपनी ही विशेषता होती है। 

पूरा समय इस उत्सव के दौरान कृष्ण भक्तों के बीच प्रसाद वितरित किया जाता है। इस दौरान सभी मंदिरों में कृष्ण भक्ति से संबंधित गीत भक्तों एवं पुजारियों द्वारा गाए जाते हैं।

मणिपुर इंफाल का कृष्ण जन्मोत्सव 

उत्तर भारत के अन्य त्योहारों के विपरीत भारत देश के इस हिस्से में कृष्णोत्सव इतना प्रसिद्ध नहीं हैं। यहाँ जन्माष्टमी के अवसर पर महाबली मंदिर, श्री गोविंद जी मंदिर में कृष्ण भक्तों की भारी भीड़ देखी जाती है।

भक्त लोग उपवास रखते हैं तथा भगवान कृष्ण को पुष्पांजलि अर्पित करते हुए मंदिर जाते हैं। लोक नृत्य प्रदर्शन मणिपुर में जन्माष्टमी उत्सव मनाने का एक प्रमुख तरीका हैं।

महाराष्ट्र मुंबई-पुणे का कृष्ण जन्मोत्सव 

भारत में उत्तर भारतीय राज्यों के अलावा यदि किसी क्षेत्र में सबसे अधिक इस उत्सव की धूम महाराष्ट्र में देखने को मिलती है। 

विशेष रूप से इस राज्य के दो बड़े शहर पूना एवं मुंबई में इस उत्सव की धूम देखते ही बनती है। लोग हर जगह कई दिनों पहले से दही हांड़ी एवं मंदिरों को सजाने की तैयारी शुरू कर देते हैं। 

महाराष्ट्र में इस दिन को दही-हांडी के रूप में मनाया जाता है, जो  दही, दूध, पानी एवं  फलों से भरे मिट्टी के बर्तन को तोड़ने के लिए प्रतियोगिताओं के द्वारा संपन्न किया जाता है। 

युवा समूह बनाते हैं, जिन्हें गोविंदा के रूप में जाना जाता है, वे एक-दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए मानव पिरामिड बनाकर ऊंचे-ऊंचे बर्तन तक पहुंचते हैं तथा  उसे तोड़ते हैं। 

इस क्रिया को श्री कृष्ण के बचपन में दही एवं माखन चोरी किये जाने के स्वरूप में मनाया जाता है । इन प्रतियोगिताएं में जीतने वाले को पैसे एवं मिठाई,फल आदि देकर सम्मानित किया जाता है। 

ओडिशा में पूरी का कृष्ण जन्मोत्सव 

भारत के इस समुद्र तटीय राज्य के पूरी शहर में आपको कृष्ण भक्ति में लीन लोग आपको आमतौर से देखने को मिल जायेंगे। 

यहाँ के लोगों की कृष्ण भक्ति का सजीव प्रमाण विशाल जगन्नाथ मंदिर है। जहाँ हर वर्ष रथ यात्रा का आयोजन किया जाता है। 

कृष्ण जन्मोत्सव के दिन लोग आधी रात तक उपवास रखते हैं जिसे कृष्ण के जन्म का समय माना जाता है और “हरे कृष्ण” और “हरि बोल” का जाप करते हैं।

मंदिरों में धार्मिक गीत गाए जाते हैं और भगवद गीता के छंदों का पाठ किया जाता है, जिन्हें विशेष उत्सव के लिए खूबसूरती से सजाया जाता है। 

उत्सव के लिए कई तरह की मिठाइयां घर पर बनाकर सभी में बांटी जाती हैं।लोग एक दुसरे के साथ सभी भेदभाव भूलकर कृष्ण भक्ति का आनंद लेते हैं। 

गुजरात में द्वारका का कृष्ण जन्मोत्सव 

भारत के  गुजरात राज्य में द्वारका शहर वह स्थान जहां भगवान कृष्ण ने अपना राज्य की नींव रखी थी। कृष्ण भगवन की नगरी होने के कारन इस शहर में इस उत्सव की महत्व अत्यधिक बढ़ जाता है। 

यहाँ के लोग इस दिन को माखन हांड़ी के रूप में मनाया जाता है। लोग जगह-जगह माखन से भरी हंडिया सजाकर लोग इस उत्सव का आनंद लेते हैं। 

भारत के त्योहारों में सबसे रंगोंभरा त्यौहार है। होली जिसमे भारत की रंगबिरंगी छठा देखते ही बनती है। होली उत्सव को अधिक गहराई से जानने के लिए Holi अवश्य पढ़े।

होली के सामान ही पति पत्नी के प्रेम के त्यौहार करवा चौथ को भी जानने के लिये प्यार भरा करवा चौथ (karva chauth) पढ़े।

जन्माष्टमी की तिथि को लेकर क्षेत्रीय भिन्नता

इस त्यौहार को मनाने की तिथि को लेकर भारत में कई सारी  क्षेत्रीय विभिन्नताएं आपको देखने को मिलेंगी। कुछ जगहों पर ये त्यौहार चंद्र तिथि अनुसार तो कहीं सौर तिथि अनुसार मनाया जाता है। 

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भारत के उत्तरी एवं पश्चिमी राज्यों में इस उत्सव की तिथि चंद्र कैलेंडर के अनुसार तय होती है, इसके विपरीत दक्षिणी राज्यों में सौर कैलेंडर के आधार पर कृष्ण जन्माष्टमी का उत्सव संपन्न होता है। 

अधिकतर इन दोनों कैलेंडर के अनुसार तिथियों में एक या दो दिनों का अंतर हीं होता है। भारत के दोनों भागों में यह उत्सव एक दो दिन के अंतराल से संपन्न होता है। 

लेकिन कुछ वर्षों में चंद्र कैलेंडर पर आधारित जन्माष्टमी तिथि तथा  सौर कैलेंडर पर आधारित जन्माष्टमी तिथि एक महीने तक भिन्न हो सकती है।

केरल, तमिलनाडु एवं कर्नाटक के कुछ हिस्सों में कृष्ण जन्माष्टमी को अष्टमी रोहिणी के नाम से जाना जाता है, क्योंकि इसे सौर कैलेंडर के आधार पर मनाया जाता है।

होली होलिका दहन महोत्सव के सामान ही गणेश उत्सव (ganesh chaturthi), दुर्गा पूजा (Durga Puja), नवरात्री (navratri) और गरबा (garba) की भी चमक धमक देखने लायक होती है। अधिक जानने के लिए उपरोक्त लिंक पर क्लीक करे एवम सम्पूर्ण विवरण प्राप्त करे।

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