यह त्यौहार एक ही समय भारत के विभिन हिस्सों में लोहरी, संक्रांति, पोंगल ( lohri, pongal, sankranti ) आदि नामो से मनाया जाता है। यह उत्सव फसलों के काटने एवं सर्दी के बाद दिनों के बड़े होने का भी प्रतिक है।

यह उत्सव सूर्य के राशि परिवर्तन कर मकर राशि में प्रवेश का समय है। सूर्य के उत्त्तरायण होने पर इस समय भारत के कई हिस्सों में इससे नव वर्ष की तरह मनाया जाता है।

ऐतिहासिक रूप से महाभारत में भी इस पर्व का उल्लेख पाया जाता है। हर बारह वर्षो के पश्च्यात इसी दिन से हिन्दू संस्कृति के महापर्व कुम्भ मेले का आरम्भ होता है।

कुम्भ मेले के समय पवित्र नदियों के संगम पर जाकर स्नान के उपरांत मंदिर में दर्शन करना होता है। दान देने को सभी दोषो का नाश होना एवं मोक्ष प्राप्ति के समान मन गया है।

Rituals | प्रचलित प्रथाये

इस अवसर के दिन तिल एवं गुड़ का सेवन विशेष रूप से किया जाता है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान कर मदिर में दर्शन करने के उपरांत दान अवश्य करना चाहिए । 

दान का महत्त्व ज्योतिष में इसलिए भी है, क्योकि तिल दान को शनि, राहु एवं केतु की बुरी दृष्टि का उपाय भी माना गया है। त्यौहार के दिन तिल के दान से शनि राहु एवं केतु की दशा से उत्पन्न परेशानियों में कमी होती है।

Pongal | पोंगल

त्योहार के तीन दिनों को “भोगी पोंगल”, “सूर्य पोंगल” और “मट्टू पोंगल” कहा जाता है। पोंगल दूध और गुड़ में उबले हुए चावल की एक मिठाई का नाम भी है, जिसका इस दिन भोग लगाया जाता है।

पोंगल त्यौहार का सबसे महत्वपूर्ण भाग इसकी मिठाई है, जो की चावल दूध एवम गन्ने के रास से बनाई जाती है। कई बार अन्य सामग्री मिलाते है।

आखरी चौथे दिन को कनुम पोंगल अथवा कन्या पोंगल कहा जाता है । इस दिन सभी मित्रो पड़ोसियों एवम रिश्तेदारों से भेट की जाती है।

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तमिलनाडु में पोंगल को “Thi” अथवा “Tai pongal” भी कहा जाता है। “Thi pongal” का अर्थ थाई महीने में ( तमिल कैलेंडर ) सुख समृद्धि की वर्षा होना है।

इतिहास में इस त्यौहार को मानाने का वर्णन पल्लव वंश के शासन काल में भी पाया जाता है।

इस त्यौहार पर यंग गर्ल सुबह जल्दी उठकर नहाना बालो में तेल लगाने के पश्चात् मिटटी की बनायीं हुई देवी कात्यायनी की मूर्ति की पूजा करती है, ताकि सभी को सुख समृद्धि प्राप्त हो।

पुरे महीने दूध से बनी मिठाई बनाना एवं बाटने की परंपरा है। मान्यता है, कि ऐसा करने से देवी की कृपा होगी, जिससे अच्छी बारिश अच्छी फसल एवं सुख समृद्धि की प्राप्ति होगी।

Lohri | लोहरी

पंजाब में लोहरी को बड़े ही उत्साह से मनाया जाता है। यही समय पंजाब में गेहू की कटाई का भी होता है।

इस दिन गोबर से देवी की छोटी प्रतिमा बनाई जाती है। जिसे अच्छे से सजाया जाता है। शाम को सूरज ढलने के बाद सभी लोग एक जगह जमा जमा होकर आग जलाते है।

लोहरी की पूजा करने के बाद नाच गाने की शुरुआत होती है। इस समय तिल गुड़ से बानी मिठाई बाटने का विशेष महत्व है।

ऐतिहासिक रूप से इस के बारे में अनेक कहानिया है। इसमें सबसे प्रसिद्द दुल्ला भट्टी की कहानी है।

जिसका वर्णन लोहरी के गानो में अक्सर आता है। दुल्ला भट्टी अकबर के ज़माने में पंजाब का एक डाकू था। जो अमीरो को लूटता था, पर वो अरब में बेचे जाने के लिए अपहरण की गई हिन्दू लड़कियों को छुड़वाता था।

उनकी शादी हिन्दू लड़को से रीती रिवाज से करवाता था। यही नहीं नव विवाहित जोड़ो को तोहफे और धन भी देता था।

Other Story| प्रचलित अन्य मिथक

कुछ का मानना है, कि पंजाब के गांवो में इस त्यौहार को लोही भी कहा जाता है। जो लोह शब्द से निकला है।

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जिसका मतलब बड़ा तवा होता है। पंजाब में सबके लिए चपाती बड़े तवे पर ही बनायीं जाती है। इसे तिलोरही नाम से भी बुलाते है। मान्यता है, कि होलिका और रोहरी दोनों बहने थी।

जो होली में जलने के बाद रोहरी तिल खाने के कारन बच गई। शायद इसलिए इस दिन तिल का इतना महत्व है। माना जाता है, कि लोहरी शब्द तिल और रोहरी के मिलने से बना है।

गुजरात में उत्तरायण

यह भी कह सकते है, कि मकर संक्रांति गुजरातियों के लिए गरबे ( Garba ) के पश्चात् आने वाला प्रमुख त्यौहार है।

गुजरातियों के लिए इस दिन का का विशेष महत्व है। हलाकि, पतंग उड़ने की प्रथा अरब मुसलिम सभ्यता से ग्रहण की गई है।

परन्तु इस दिन गुजरात में पतंग उड़ने का विशेष महत्व है, वे इससे नव वर्ष के आगमन के रूप में मानते है। पतंग उड़ाना बहु प्रचलित परंपरा है।

कई अंतरराष्ट्रीय आगंतुक है, जो दुनिया भर से आते हैं। जापान, इटली, ब्रिटेन, कनाडा, ब्राजील, इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया, संयुक्त राज्य अमेरिका, मलेशिया, सिंगापुर, फ्रांस, चीन और कई देशो से उत्सव में भाग लेने के लिए आते है।

आयोजन के दौरान फूड स्टॉल और कलाकारों के साथ पतंग बाजार में बेचे जाते हैं। पतंग आम तौर पर प्लास्टिक, लकड़ी, धातु, नायलॉन और अन्य स्क्रैप सामग्री जैसी सामग्री के साथ बनाए जाते हैं।

लेकिन उत्तरायण के लिए हल्के वजन वाले कागज और बांस से बने होते हैं, और ज्यादातर केंद्रीय रीढ़ तथा धनुष के आकार के होते है।

इस त्योहार का प्रतीक देवताओं को उनकी गहरी नींद से जगाना है। इस दिन को भारत में सबसे महत्वपूर्ण फसल दिवस में से एक माना जाता है।

गुजरात के कई शहर अपने नागरिकों के बीच पतंग प्रतियोगिता का आयोजन करते हैं, जहाँ सभी लोग एक दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा करते हैं।

Conclusion | साराँश

हर वर्ष यह त्योहार 14 जनुअरी को पूर्ण भारत में ही मनाया जाता है। यधपि इस त्यौहार का एक नाम से न होकर कई अन्य नाम भी है।

जैसे की असम में इससे बिहू के नाम से मनाया जाता है। संपूर्ण भारत में इससे फसलों की कटाई एवं सुख समृद्धि के आगमन से जोड़कर देखा जाता है।

आसाम में इसे बिहू (Bihu) के रूप में जाना जाता है। मूल रूप से यह समय संपूर्ण भारत में नयी फसल के कटने के बाद आने वाली समृद्धि की संभावनाओं को उतसव के रूप में व्यक्त करने का समय है।

हर परिवार अवं उसका हर सदस्य इसे अपने लिए नयी आशा के रूप में देखता है, और उसे सामाजिक तौर पर उत्सव मना कर व्यक्त करता है।

में भी आशा करता हु की यह उत्सव आप सभी के जीवन में नए अवसर लेकर आये। आप के जीवन में इस उत्सव के साथ ही आपके स्वर्णिम समय का आरम्भ हो।

इस त्यौहार के पश्चात् मघा नवरात्री (navratri) का आरंभ होता है। आप अपने विचार अवं शुभकामनाए नीचे कमेंट में लिख सकते है अथवा सोशल साइट्स पे शेयर कर सकते है।

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