स्वर-योग तत्व ज्ञान से दिव्य दृष्टि ( Tatv gyan se divya drishti ) संबंधी जो ग्रंथ उपलब्ध होते हैं, उनमें प्रश्नोत्तर या भविष्य कथन के संबंध में भी कुछ उल्लेख मिलता है।

जिस मनुष्य को स्वर, ज्ञान है, लक्ष्मी उसके चरणों के नीचें रहती है, और उसका शरीर भी सर्वत्र सदा सुखी रहता है। परोक्ष ज्ञान के लिए स्वर शास्त्र के अंतर्गत एक बात ही गुप्त साधना है।

वह इतनी महत्त्वपूर्ण और विचारणीय है, कि उसका उपयुक्त नाम तत्त्वज्ञान’ रखना पड़ा है। तत्त्व का अर्थ सार भांग, मूल कस है। आध्यात्मिक विज्ञान में तत्त्ज्ञान शब्द का उपयोग वहाँ होता है, जहाँ आत्मा और ईश्वर के संबंध की चर्चा होती है।

भौतिकशास्त्री प्रकृति विज्ञान के मूलभूत कारणों को तत्त्व कहते हैं। स्वर-योग में ऐसी ही अंतरंग साधनाएँ हैं, जिन्हें महत्त्व के अनुरूप ही तत्तवज्ञान’ नाम मिला है।

स्वर के साथ-साथ तत्त्वों का उदय भी होता है। जब तक एक स्वर चलता है, तब तक पाँचों तत्व क्रमशः: एक-एक बार उदय होते हैं और अपने समय को पूरा करके अस्त हो जाते हैं।

जिस प्रकार रमल विद्या यां कोष्ठों, पर हाथ रखवाकर अथवा नामाक्षर आदि गिनकर फलित ज्योतिष का कुछ भाग बहुत सरल बना लिया गया है, उसी प्रकार के कुछ प्रसंग इस विद्या में भी पाये जाते हैं।

Tatv gyan se divya drishti swara yoga dvara uttar | प्रश्न उत्तर

प्रश्नकर्ता को प्रश्न विचारक के पास कोई पुष्प अथवा रक्त वर्ण की वस्तु लानी चाहिए, जिससे उसके आते ही विचारक यह समझ लें कि आगंतुक प्रश्नकर्ता है, और स्वर आदि के विषय में सतर्क हो जाये।

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प्रश्न उत्तर

जब प्रश्न विचारने वाले का इडा (बायाँ) स्वर चल रहा हो और प्रश्नकर्ता ऊपर, सामने या बाईं ओर से प्रश्न करे अथवा प्रश्न-विचारक के सूर्य स्वर में प्रश्नकर्ता नीचे, पीछे अथवा दाहिनी ओर से प्रश्न करें तो कार्य की सफलता है।

इसके विपरीत हो तो असफलता समझनी चाहिए। विचारक के पूरक में प्रश्न करना शुभ है तथा रेचक में अशुभ अर्थत्‌ जिस समय प्रश्न करे और विचारक श्वास भीतर खींचता हो तो शुभ और बाहर छोड़ता हो तो अशुभ।

विचारक श्वास लेकर कुंभक (रुकी हुई श्वास) से एक पुष्य ऊपर फेंके। यदि पुष्प चलित स्वर की ओर गिरे तो प्रश्न की सफलता समझों और यदि अचलित स्वर की ओर गिरे तो असफलता समझनी चाहिए।

प्रश्नकर्ता प्रश्न पूछने के समय यदि पूर्व तथा उत्तराभिमुख हो और चंद्र स्वर चलता हो अथवा दक्षिण-पश्चिम की ओर उसका मुख हो और सूर्य-स्वर चलता हो तो शुभ समझो अन्यथा अशुभ।

यदि चलित स्वर की ओर प्रश्न किया जाए तो कार्य कैसा ही कठिन हों, लाभ होगा। चलित स्वर की ओर से कर्कश स्वर मेँ प्रश्न किया जाए तो लाम अवश्य होगा, किंतु कष्ट के साथ।

प्रश्नकर्ता यदि पहले अचलित स्वर से प्रश्न करे और फिर चलित स्वर की ओर आ बैठे तो कठिनाई के साथ सफलता मिलेगी। प्रश्नकर्ता को नीचे खड़ा होकर नम्न बचनों से प्रश्न पूछना शुभ है और ऊँचे स्थान पर कठोर शब्दों में पूछे तो अशुभ है।

इसी प्रकार के या थोडे-बहुत हेर-फेर से युद्ध, यात्रा, परदेशी का आगमन, मित्रता, विग्रह, वर्ष-फल आदि के प्रसंग आते हैं। गंभीर दृष्टि से विचार करने पर ऐसा मालूम होता है, साधारणत: एक स्वर एक घंटे चलता है।

मान लीजिए कि इस स्वर का फल अशुभ होता हो और इस एक घंटे में 10 व्यक्ति प्रश्न पूछने आयें तो क्या उन सबको ही अशुभ फल बता दिया जायेगा ?

यदि कोई महानुभाव इस प्रकार की फलित विद्या फैलाएँगे तो अपयश ही मिलेगा और साथ ही इस महाविज्ञान से समाज को भारी क्षति पहुँचेगी।

Tatv gyan se divya drishti ka adhar | तत्व ज्ञान से दिव्य दृष्टि का आधार

मनुष्य का साधारण ज्ञान बहुत हीं कम है, किंतु उसके अंदर अप्रत्यक्ष कई गुप्त बातों को जानने की शक्ति छिपी हुई पड़ी है। संजय महाभारत का सारा दृश्य बहुत दूर रहते हुए भी अपनी दिव्य दृष्टि से देखते थे और उसका वर्णन ध्रृतराष्ट्र को सुनाते थे।

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तत्व ज्ञान से दिव्य दृष्टि का आधार

इसी प्रकार दिव्य श्रवण, दिव्य ज्ञान आदि के असंख्य उदाहरण हमारे प्राचीन इतिहास में मिलते हैं। अखिल विश्व ब्रह्मांड आकाशतत्त्व (ईथर) से परिपूर्ण भरा हुआ है।

संसार में जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष घटनाएँ होती हैं, उनके कंपन उठते रहते हैं। किसी कार्य का स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होना यह तो उसकी अंतिम अवस्था है। यथार्थ में उस कार्य का आरंभ बहुत ही पहले हो जाता है।

हम दुकान खोल लेते हैं, दुकान का उद्घाटन देखना हो तो सूक्ष्म दृष्टि से अंतिम कार्य हुआ। उसका आरंभ तो बहुत दिन पूर्व–तभी से हो रहा था, जबसे कि उस प्रकार के विचार हमारे मस्तिष्क में उठने शुरू हुये थे।

उन विचार-कंपनों द्वारा दुकान खुलने तक बड़ा भारी कार्य होता रहता है। यद्यपि हम इसे नहीं जान पाते, तो भी कार्यों का होता रहना निस्संदेह है।

किसी घटना के घटित होने से पूर्व ईथर में तत्संबंधी जो हलचलें होती हैं, उनके अप्रत्यक्ष और गुप्त भाव हमारे पास तक पहुँचते रहते हैं।

यदि किसी का मन इतना स्वच्छ हो कि वह इन सूक्ष्म कंपनों के प्रवाह को समझ सके तो निस्संदेह गुप्त और भविष्य में होने वाली घटनाओं को वह जान सकता है।

हमारी नाक, कान, आँख आदि स्थूल इंद्वियाँ बहुत ही मामूली शक्ति रखती हैं। आँखें केवल उन्हीं पदार्थों को देख सकती हैं,जिनसे नेत्रों के ज्ञान-तंतुओं से टकराने वाली एक विशेष प्रकार की ज्योति निकलती है।

इसके अतिरिक्त वायु आदि बहुत-से ऐसे मामूली और मोटे पदार्थ हैं, जिनमें से नेत्रों के अनुकूल प्रकाश कंपन उत्पन्न नहीं होते, अतएव उनकी उपस्थिति दृष्टिगोचर होती है।

कानों से ‘एक विशेष दर्जे के धीमे शब्द सुनाई पड़ते हैं, प्रति सेकंड तीस से लेकर पचास हजार एक बार जिनकी थरथराहंट होती है, केवल वहीं शब्द हम सुन सकते हैं। इससे ऊँचे और नीचे शब्द को सुनने में यह कान असमर्थ हैं।

रक्तवर्ण से लेकर ऊदे रंग तक के सात रंग और उनके मिश्रणों को ही आँखें पहचानती हैं। इनके अतिरिक्त जो हजारों प्रकार के रंग की सूक्ष्म वस्तुएँ हैं, वह पहचानने में नहीं आती। फिर जो मामूली इंद्रिय शक्ति हम लोगों में होती है, वह भी सबमें एक-सी नहीं होती।

किसी की तेज होती है, तों किसी की सुस्त। वैज्ञानिकों ने सिद्ध कर दिया है कि यदि हमारी इंद्रिय शक्ति को कुछ और सहायता मित्र जाए तो वे वर्तमान ज्ञान की अपेक्षा बहुत अधिक बातें जान सकती हैं।

रोन्टजन रश्मियों की सहायता से गैस और तमोमय पदार्थों का अंतराल देखा जा सकता है। इन किरणों की सहायता से संदूक में बंद चीज़ों को देख सकते हैं। बंद चिद्ठयों को पढ़ सकते हैं, दीवार की आड़ में रखी हुई चीजों को देख सकते हैं।

एक्सरेज द्वारा शरीर के अंदर के चित्र हम रोज उतरते हुए देखते हैं।

Divya drishti development using senses | इंद्रियों द्वारा दिव्य दृष्टि विकसित करना

मनुष्य का पिंड-देह स्थूल देह का सूक्ष्म भाग है और उसके अंतर्गत है, इसलिए उसकी ज्ञानेंद्रियों में अखिल प्रकाश भरा रहता है।

यदि इंद्रियों की सूक्ष्म शक्तियों को ऐसा जाग्रतू कर लिया जाए कि वह अपने आंतरिक आकाश में होने वाले कंपनों की गतिविधि का कुछ अधिक अनुभव कर सकें, तो निश्चय ही उसे वैसा ही दिव्य ज्ञान प्राप्त हो सकता है, जैसा कि कुछ सिद्ध योगियों में देखा जाता है।

अध्यात्म विद्या के मर्मज्ञों का कथन है कि शरीर में मूलाधार आदि चक्र हैं। यह दिव्य शक्तियों के सूक्ष्म केंद्र हैं। इन केंद्रों को इंद्रिय नहीं समझा जाता, क्योंकि इनसे आँख-कान की तरह देख या सुन नहीं सकते, फिर भी यह अंतर्जगत्‌ की इंद्रियाँ ही हैं।

यह एक प्रकार के भैंवर हैं। जैसे नदी के मैंवरों में बहता हुआ पानी एक परिक्रमा देकर आगे बढ़ता है, उसी प्रकार सूक्ष्म कपन अपने अनुकूल भैंवरों (चक्रों) की परिक्रमा हमारे शरीर के अंदर भी करते हैं।

अद्भुत बातों का जानना असंभव नहीं है, केवल दर्जे का भेद है। जब हम ऊँचे दर्जे में पहुँच जाते हैं, तो विश्व का भूगोल पढ़कर बहुत बातें मालूम कर लेते हैं, किंतु उन सब बातों को उस समय नहीं समझ सकते, जब छोटे दर्जे में पढ़ते हैं।

स्वस्योग का तत्त्व-विज्ञान केंद्र स्थानों, चक्रों में स्थित इंद्रियों को प्रोत्साहित, जाग्रत्‌ और स्वच्छ करता है, जिससे संसार की विभिन्न प्रकार की घटनाओं के संबंध में जो कंपन उठ रहे हैं, उनका ज्ञान प्राप्त किया जा सके।

तत्त्व ज्ञान का अभ्यासी अपनी सूक्ष्म ज्ञानेंद्रियों की शक्ति को उसी प्रकार उन्नत करता जाता है, जैसा छोटा बालक घीरे-धीरे इंद्रियों को प्रबुद्ध बनाता जाता है। योगशास्त्र के आद्य भगवान्‌ शंकर ने परोक्ष विज्ञान के एक मार्ग तत्त्व ज्ञान का उपदेश किया है।

वह प्राय: वर्तमान ग्रंथों में जिस प्रकार मिलता है, उसका कुछ सारांश आगे दिया जा रहा है।

Chakras, Tatv gyan, divya drishti swara yoga | चक्र, तत्व ज्ञान, दिव्य दृष्टि

षट्चक्र भेदन की भौँति स्वर-विज्ञान में तत्त्वों की उपासना करनी पड़ती है, और जानना होता है कि इसमें इस समय कौन-सा तत्त्व विद्यमान है ? तत्त्वों की कुछ जानकारी निम्न है।

इस तत्त्व का स्थान पूजाधार चक्र अर्थात्‌ गुदा से दो अंगुल अंडकोर्षो क्री ओर हटकर में स्थित है। सुषुम्ना का आरंभ इसी स्थान से होता है। प्रत्येक तत्त्व चक्र का आकार कमल के पुष्प जैसा है।

यह ‘मूलोक’ का प्रतिनिधि है। पृथ्वी तत्व का ध्यान इसी मूलाधार चक्र में किया जाता है। पृथ्वीतत्त की आकृति चतुष्कोण, रंग पीला, गुण गंध है, इसलिए इसको जानने की इंद्रिय नासिका तथा कर्मेंद्रिय गुदा है।

शरीर में पीलिया, कमलवायु आदि रोग इसी तत्त्व की विकृति से चैदा होते हैं। मय आदि मानसिक विकारों में इसकी प्रधानता होती है। इस तत्त्व के विकार मूलाधार चक्र में ध्यान स्थित करने से अपने आप शांत हो जाते हैं।

साघन विधि

सबेरे जब एक पहर अंधेरा रहे, तब किसी शांत स्थान और पवित्र आसन पर दोनों पैरों को पीछे की ओर मोड़कर उन पर बैठें। दोनों हाथ उलटे करके घुटनों पर इस प्रकार रखो। जिससे उंगलियों के छोर पेट की ओर रहें।

फिर नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि रखते हुए मूलाधार चक्र में ‘लं’ बीज वाली चौकोर पीले रंग की पृथ्वी का ध्यान करें। इस प्रकार करने से नासिका सुगंधि से भर जाएगी और शरीर सोने के समान कांति वाला हो जाता है।

ध्यान करते समय ऊपर कहे हुए पृथ्वीतत्त के समस्त रॉ को अच्छी तरह ध्यान में लाने का प्रयत्त करना चाहिए ‘ल’ इस बीज मंत्र का मन ही मन (शब्दरूप से नहीं, वरन्‌ ध्वनिरूप से) जप करते जाना चाहिए।

Water Element | जलतत्त्व

पेडू के नीचे, जननेंद्रिय के ऊपर मूल भाग में स्वाधिष्ठान चक्र में जलतत्त्व का स्थान है। यह चक्र ‘भुव:’ लोक का प्रतिनिधि है। रंग श्वेत, आकृति अर्ध चंद्राकार और गुण रस है। कट, अम्ल, तिकत आदि सब रसों का स्वाद इसी तत्त्व के कारण आता है।

इसकी ज्ञानेंद्रिय जिल्ल और कर्मेंद्रिय लिंग है। मोहादि विकार इसी तत्त्व की विकृति से होते हैं।

साघन विधि

पृथ्वीतत्त का ध्यान करने के लिए बताई हुई विधि में आसन पर बैठकर ‘बं” बीज वाल अर्ध चंद्राकार चंद्रमा की तरह कांति वाले जलतत्त्व का स्वाधिष्ठान चक्र में ध्यान करना चाहिए। इससे भूख-प्यास मिटती है और सहन-शक्ति उत्पन्न होती है।

Fire Element | अग्नितत्त्व

नाभि स्थान में स्थित मणिपुरक चक्र में अग्नितत्त्त का निवास है। यह ‘स्व: लोक’ का प्रतिनिधि है। इस तत्त्व की आकृति त्रिकोण, रंग लाल, गुण रूप है। ज्ञानेंद्रिय नेत्र और कर्मेंद्रिय पाँव हैं।

क्रोध आदि मानसिक विकार तथा सूजन आदि शरीरिक विकार इस तत्त्व की गड़बड़ी से होते हैं। इसके सिद्ध हो जाने पर मंदाग्नि, अजीर्ण आदि पेट के विकार की हो जाते हैं और कुंडलिनी शक्ति के जाग्रतू होने में सहायता है।

साधन विधि

नियत आसन पर बैठकर ‘ बीज मंत्र वाले, त्रिकोण आकृति के और अग्नि के समान लाल प्रभा वाले अग्नि तत्त्व का मणिपूरक चक्र में ध्यान करें।

इस तत्त्व के सिद्ध हो जाने पर अत्यंत अन्न ग्रहण करने की शक्ति, अत्यंत पीने की शक्ति और धुव तथा अग्नि के सहन करने की शक्ति आ जाती है।

Air Element | वायुतत्त्व

यह तत्त्व हृदय देश में स्थित अनाहत चक्र में है, एवं महललोक’ का प्रतिनिधि है। रंग हरा, आकृति षट्कोण तथा गोल दोनों तरह की है। गुण स्पर्श, ज्ञानेंद्रिय त्वचा और कर्मद्रिय हाथ है। वात, व्याधि, दमा आदि रोग इसी विकृति से होते हैं।

साधन विधि

नियत विधि से स्थित होकर “यं” बीज वाले, गोलाकार, हरी आमा वाले वायुतत््व का अनाहत चक्र में ध्यान करें। इससे आकाश गमन तथा पक्षियों की तरह उड़ना सिद्ध होता है।

Sky Element | आकाशततत्त्व

शरीर में इसका निवास विशुद्ध चक्र में है। यह चक्र कंठ स्थान में ‘जनः लोक’ का प्रतिनिधि है। इसका रंग नीला, आकृति अंडे की तरह लंबी गोल, गुण शब्द, ज्ञानेंद्रिय कान तथा कर्मद्रिय वाणी है।

साधन विधि

पूर्वोक्त आसन पर से हं’ बीज मंत्र का जप करते हुए चित्र-विचित्र रंग वाले आकाशतत्त्व का विशुद्ध चक्र में ध्यान करना चाहिए। इससे तीनों कालों का ज्ञान, ऐश्वर्य तथा अणिनादि अष्ट सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। है

नित्यप्रति पाँचों तत्त्तों का छह मास तक अभ्यास करते रहने से तत्त्व सिद्ध हो जाते हैं फिर तत्त्व को पहचानना सरल हो जाता है।

सूक्ष्म शरीर से सम्बंधित अधिक जानकारी के लिये चक्रो के रहस्य को जाने ( Chakras Secret Reveal ) एवं कुण्डलिनी ( kundalini door to unlock body secrets ) का भी अध्ययन करे।

Element Finding Methods | तत्त्व परीक्षा के मुख्य प्रकार

स्वर के साथ-साथ तत्त्वों का उदय भी होता है। जब तक एक स्वर चलता है, तब तक पाँचों तत्व क्रमशः: एक-एक बार उदय होते हैं और अपने समय को पूरा करके अस्त हो जाते हैं।

Breathing | श्वास द्वारा

तत्त्वों के उदय के साथ नथुने में चलते हुए श्वास की गति बदलती है। यदि नथुनों के बिल्कुल बीच में वायु चल रही हो तो पृथ्वीतत्त्व, नीचे की ओर चल रहा हो तो जलतत्त्व, तिरछा अर्थात्‌ एक ओर चल रहा हो तो वायुतत्त्व, ऊपर की ओर चल रहा हो तो अग्नितत्त्व।

यदि चारों ओर घूमता हुआ चल रहा हों तो आकाशतत्त्व का उदय जानना चाहिए।

Shape | आकृति द्वारा

किसी स्वच्छ दर्पण के ऊपर जोर से नाक द्वारा वायु छोड़िये। इससे दर्पण के ऊपर श्वास की भाष से कुछ आकृति बन जाएगी, इससे तत्त्व की परीक्षा हो सकती है।

यदि चौकोर आकृति बने तो पृथ्वी, अर्घ-चंद्राकार बने तो जल, त्रिकोण बने तो अग्नि, लंबाई लिये हुए गोल बने तो वायु और छोटी बिंदियाँ-सी बनें तो आकाशतत्त्व जानना चाहिए।

Position | मूल स्थान द्वारा

पीछे बताया जा चुका है कि शरीर के किस स्थान पर किस तत्त्व का मूल स्थान है ? ध्यान करने पर जिस स्थान में विशेष चेतना मालूम पड़े और तत्त्व के निर्धारित रंग-रूप प्रत्यक्ष प्रदर्शित होने लगें तो उसी स्वर का उदय समझना चाहिए।

Length | लंबाई द्वारा

खूब अच्छी तरह बारीक घुनी हुई रुई या बारीक धूल हथेली पर उस नथुने के पास धीरे-धीरे ले जानी चाहिए, जिससे श्वाप्ष चल रही हो।

जितनी दूरी पर प्रथम रुई या धूल श्वास की हलचल के कारण जरा भी हिलने लगे, वहीं ठहर जाओ और नाक से उसकी दूरी नाप लो।

यदि वह 12 अंगुल हो तो पृथ्वी, 16 अंगुल हो तो जल, 4 अंगुल हो तो अग्नि, 8 अंगुल हो तो वायु और 20 अंगुल हो तो आकाशततत्त्व उदय जानना चाहिए।

Taste | स्वाद द्वारा

ध्यानपूर्वक परीक्षा करने से मालूम होता है कि बिना कुछ खाये हुए भी जिव्हा में अलग-अलग सम्यों में अलग-अलग रसों के स्वाद आति रहते हैं।

सूक्ष्म दृष्टि से परीक्षा करने पर यदि मुख मैं मीठा स्वाद प्रतीत हो तो पृथ्वी, कसैला हो त्तौ जल, क्डुआ हो तो अग्नि, खट्‌टा हो तो वाय्यु और तीखा हो तो आकाशतत्त्व समझना चाहिए।

Time | समय द्वारा

साधारण एक स्वर एक घंटा चलता है, जिसमें पृथ्वी तत्त्व 20 मिनट, जलत्तत्व 16 मिनट, अग्नितत्व 42 मिनट, वायुतत्व 8 मिनट और आकाशतत्व 4 मिनट रहता है।

तत्त्व परीक्षा

तत्त्व की परीक्षा के लिए जहाँ ध्यानावस्थित होकर परीक्षा करने का उल्लेख है, वहाँ षड्मुखी मुद्रा द्वारा ध्यान करना समझना चाहिए।

दोनों कानों पर दोनों हाथ के अँगूठे, दोनों आँखों पर दोनों हार्थों की तर्जनी और मध्यमाएँ, दोनों नथुनों पर दोनों अनामिकाएँ और दोनों होठों के बीच अर्थात्‌ मुँह में कनिष्ठकाएँ लगाकर ध्यान करना चाहिए।

स्वर संबंधी ध्यान के लिए यही मुद्रा उपयुक्त बताई गई है। किसी प्रश्न का उत्तर देने के लिए जब विचारक पाँच मिनट तक एकाग्रता कर ले, तब देखें कि मेरा किस स्वर में कौन तत्त्व उदय हो रहा है, उसी के अनुसार उत्तर दैना चाहिए।

यदि सूर्य स्वर में अग्नितत्त्व हो, तब कार्य सिद्ध न होगा। यदि अग्नि और पवन मिले हुए हों तो शीघ्र सिद्धि होगी, पवन हो तो कुछ विलंब में होगी, पृथ्वी और जलतत्त्व हर कार्य में शुभ सूचक हैं।

सूर्य स्वर में आकाशतत्त्त हो, तो भयंकर हानि की समावना रहता है। चंद्र-स्वर में पृथ्वीतत्त्त हो तो 12 दिन में, जल और पृथ्वी- तत्व हो तो 13 दिन में, केवल जल हो तो 3 दिन में, पवन हो तो 8 दिन में सिद्धि होती है।

अग्नितत्त्व में हानि और आकाश में अनिष्ट की आशंका रहती है। पृथ्वीतत्त्व में स्थिर कार्य, जलतत्त्व में चलते-फिरते कार्य, अग्नितत्त्व में क्रूर कर्म, पवनतत्त्व में हत्या, कूट-नीति आदि सफल होते हैं, एवं आकाशतत्त्व में सब कार्यों में असफलता होती है।

पृथ्वी और जलतत्त्व में सिद्धि तत्त्व से मृत्यु, वायु से नाश और आकाश में निष्फलता प्राप्त होती है। पृथ्वीतत्त्व में देर से लाभ, जलतत्त्व में तत्क्षण लाभ, वायु और अग्नि में हानि तथा आकाश में निराशा होती है।

चंद्र-स्वर में पृथ्वी और जलतत्त्व तथा सूर्य स्वर में अप्नि-तत्व जिस समय हो उस समय अच्छे-बुरे सब कार्यों की सिद्धि होती है। दिन में पृथ्वीतत्तत से और रात्रि में जलतत्त्त से लाभ होता है।

जीवन, जय, लाम, कृषि, धन उपार्जन, मंत्र सिद्धि, युद्ध, प्रश्न, गमन, आगमन में पृथ्वीतत्तव श्रेष्ठ है। पृथ्वीतत्त्व में बहुतों के साथ गमन जल और वायु में अकेले गमन, अग्नि में दो मनुष्यों के साथ और आकाश में कहीं भी गमन न करना चाहिए।

पूर्व दिशा में पृथ्वी, पश्चिम में जल, दक्षिण में अग्नि और उत्तर में वायुतत्त्व बलवान्‌ होते है। इन दिशाओं संबंधी कार्य इन्ही तत्त्वों में करने पर बहुत शुभ होते हैं। वायुतत्त्व में युद्ध करने पर संफलता मिलती है।

सम्वत्सर जिस दिन प्रारंभ होता हो, उस दिन कुछ समय एकाग्रता करने पर तत्त्व के उदय का शुभ-अशुभ फल देखते हुए आगामी वर्ष का फल जाना जा सकता है।

शुभ और अशुम के फल तो तत्त्व विद्या के आरंभिक अभ्यासियों के लिए थोड़ा-सा पथ-प्रदर्शन मात्र है। कुछ अधिक अभ्यास होने पर तो उसे गुरु बातों का प्रत्यक्ष अनुभव अपने आप होने लगता है।

जो व्यक्ति तत्त्वों के रूप, गति, स्वाद, मंडल और लक्षण इन सबको जानता है, वह तत्त्वों के हेल-मेल में भी पृथक-पृथक्‌ मार्गों को जान लेता है।

स्वर शास्त्र विज्ञानं के आधारभूत नियमो को जानने के लिये स्वर शास्त्र विज्ञान (Swara), स्वर योग से रोग निवारण (Swara yoga healing) एवं स्वर योग से मनचाही संतान उत्पन्न करना को भी विस्तार पूर्वक अध्यन करे।

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