वास्तु ( vastu ) अथवा वास्तुकला को गृह निर्माण का विज्ञानं कहते है। यह प्राचीन उपदेशो का संकलन है, जो बताते है, कि कैसे प्रकृति के नियम हमारे आवास को प्रभावित करते हैं।

इसे वास्तु शास्त्र, वास्तु वेद और वास्तुविद्या के नाम से भी जाना जाता है। वर्तमान समय में भी यह प्रासंगिक है, और भवन निर्माण में इसे विचार किया जाता है।

वास्तु शास्त्र में घर की साज सज्जा के रेखांकन दिशात्मक संरेखण पर आधारित होते हैं। प्राचीन काल में मुख्य रूप से विशेष रूप से मंदिरों के निर्माण के लिए वास्तुकला में वास्तु शास्त्र का प्रयोग होता था।

हालांकि समय के साथ अन्य रूपों में इसमें वाहन, बर्तन, फर्नीचर, मूर्तिकला आदि सहित अन्य चीज़े भी समाहित हो गयी हैं।

वास्तु शास्त्र के प्रणेता के रूप में ऋषि मामुनि माया को माना जाता है, वही उत्तर भारत में विश्वकर्मा को इसका सृजक माना गया है।

पूर्व में लंबे समय तक वास्तु शास्त्र अनिवार्य रूप से भारतीय मंदिर वास्तुकला तक ही सीमित था, हाल के दशकों में ही इसका पुनरुद्धार हुआ है।

विशेष रूप से जिसका श्रेय स्वर्गीय वी. गणपति स्थपति को जाता है, जो 1960 से आधुनिक भारतीय समाज में वास्तु परंपरा की पुनर्रस्थपना के लिए अभियान चलाते रहे।

Vastu meaning | वास्तु शास्त्र का अर्थ

संस्कृत भाषा में वास्तु शब्द का अर्थ है, एक आवास या घर जिसमें भूमि का एक समान भूखंड होता है। भूमि, भवन या निवास-स्थान, कार्य स्थल, शहर निर्माण आदि के अनुसार इसे वर्गीकृत किया गया है।

इस वास्तु शब्द का अंतर्निहित अर्थ जड़, वास, रहना, या निवास करना है। शास्त्र शब्द का अनुवाद सिद्धांत, शिक्षण के रूप में किया जा सकता है।

इस का शाब्दिक अर्थ सही रूप से निवास स्थान का विज्ञान होता है, जो वास्तुकला के प्राचीन संस्कृत नियमावली को बताता हैं। इनमें वास्तु-विद्या शाब्दिक रूप से, निवास का ज्ञान सम्मिलित है।

History of Vastu | वास्तु शास्त्र का इतिहास

भारतीय हिन्दू शास्त्रों में भगवान विश्वकर्मा को वास्तुशिल्प और वास्तुकला से संबंधित कामों का देवता माना जाता है। कुछ अन्य मत भी है, परन्तु विद्वान कपिला वात्स्यायन इसे अटकलें मानते हैं।

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वास्तु शास्त्र के उदय को सिंधु घाटी सभ्यता और वास्तु शास्त्र में रचना के सिद्धांतों के बीच की कड़ी स्थापित करने के लिए कई कहानियों और सिद्धांतों को जोड़ा गया हैं।

किन्तु अब तक इनके मध्य संबंध को लेकर कोई ठोस प्रमाण नहीं है, क्योंकि सिंधु घाटी की लिपि अस्पष्ट बनी हुई है।

कुछ लोगों का मत है, कि वास्तु शास्त्र की जड़ें पहली शताब्दी के पूर्व के साहित्य से जुडी हैं, क्योंकि इसके विषय में कोई लिखित प्रमाण नहीं है। ये विचार भी पूरी तरह से सही साबित नहीं किया जा सकता।

Principals of Vastu Shatra | वास्तु शास्त्र के मूल सिद्धांत

वास्तु शास्त्र में कई सिद्धांत हैं, जिनमे ज्यामितीय गणना का उपयोग एक भवन के विभिन्न भागो में आनुपातिक संबंधों के लिए किया जाता है।

भारतीय दर्शन के सामान ही इसमें भी पंच तत्वों को ही निर्माण का मूल आधार माना गया है। मानव विशेष अथवा स्थान विशेष के उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए पांच तत्वों और दिशाओ की गणना कर परस्पर सामंजस्य बिठाया जाता है।

सभी पांच मूल तत्वों के बीच एक अदृश्य और निरंतर संबंध बना रहता है। इस प्रकार, व्यक्ति इन पांच प्राकृतिक शक्तियों की प्रभावशीलता को समझकर अपनी इमारतों को ठीक से डिजाइन करके अपनी स्थितियों में सुधार कर सकता है।

वास्तु शास्त्र प्रकृति के सभी पांच तत्वों को जोड़ता है, और उन्हें व्यक्ति और सामग्री के साथ संतुलित करता है।

यह जीवन यापन और कार्य अनुकूल वातावरण बनाने के लिए प्रकृति के पांच तत्वों द्वारा दिए गए लाभों का लाभ उठाता है। जिससे स्वास्थ्य, धन, समृद्धि और खुशी में वृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।

पांच तत्वों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है।

1 Earth | पृथ्वी

पृथ्वी, सूर्य के क्रम में तीसरा ग्रह है, जो सूर्य के केंद्र के चुंबकीय आकर्षण के रूप में उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों के मध्य समंजय बिठाता है।

इसके चुंबकीय क्षेत्र और गुरुत्वाकर्षण बल का पृथ्वी, सजीव और निर्जीव सभी चीजों पर काफी प्रभाव पड़ता है।

Water | जल

जल को वास्तु शास्त्र में वर्षा, नदी, समुद्र द्वारा दर्शाया जाता है, और तरल, ठोस (बर्फ) और गैस (भाप, बादल) के रूप में भी होता है।

यह हर पौधे और जानवर के शरीर का हिस्सा है। हमारे शरीर में खून का ज्यादातर भाग पानी से बना है।

Air | वायु

जीवन के सहायक तत्व के रूप में, वायु एक बहुत शक्तिशाली जीवन स्रोत है।

मानव जीवन में भौतिक सुख, मूल्य सीधे और संवेदनशील रूप से सही आर्द्रता, वायु प्रवाह, हवा का तापमान, वायुदाब, वायु संरचना और इसकी सामग्री पर निर्भर करता हैं।

Fire | आग

आग या अग्नि प्रकाश और गर्मी का प्रतिनिधित्व करता है, जो दिन, रात, मौसम, ऊर्जा, उत्साह, जुनून और जोश के लिए जिम्मेदार होता है।

Space | आकाश

आकाश उपरोक्त सभी तत्वों को आश्रय प्रदान करता है। इसे सार्वभौमिक संदर्भ में सभी ऊर्जा स्रोतों का प्राथमिक संवाहक भी माना जाता है

भौतिक ऊर्जा जैसे ध्वनि और प्रकाश, सामाजिक ऊर्जा जैसे मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक, और संज्ञानात्मक ऊर्जा जैसे बुद्धि और अंतर्ज्ञान।

Direction | दिशा

चार मुख्य दिशाएँ उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम तथा चार उप दिशाएँ उत्तर-पश्चिम, उत्तर-पूर्व, दक्षिण-पश्चिम और दक्षिण-पूर्व हैं।

प्रत्येक दिशा पथ जीवन के एक अलग पहलू का प्रतिनिधित्व करता है, और एक अलग भगवान या देवता द्वारा शासित होता है।

उत्तर दिशा जहां धन से जुड़ी है, वहीं दक्षिण धर्म से जुड़ी है। पश्चिमी और पूर्वी दिशा स्थिरता और समग्र सफलता के लिए अनुकूल होती हैं।

Objective of Vastu shastra | वास्तु शास्त्र का उद्देश्य

अब जब हम सभी इस बात से अवगत हैं, कि डिजाइन और निर्माण करते समय वास्तु शास्त्र के सिद्धांतों का पालन करके, हम प्राकृतिक असंतुलन के लाभों को अधिकतम उपयोग कर सकते हैं।

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निर्माण सम्बन्धी समस्याओं को रोकने और वास्तु शास्त्र के लाभों को अधिकतम करने के लिए इन मूलभूत वास्तु नियमों को लागू करने के कुछ प्राथमिक लक्ष्य निर्धारित किये गए हैं।

यहाँ कुछ रणनीतियाँ और तकनीक हैं जो वास्तु विचारधारा के लिए मौलिक नियम हैं:

Dharma | धर्म

प्राकृतिक शक्तियों का उपयोग करते हुए, प्राथमिक लक्ष्य भवन में रहने वालों को आध्यात्मिक संतुष्टि प्रदान करना है।

इतना ही नहीं, बल्कि धर्म की शिक्षाएं परिवारों, परिचितों, कंपनियों और समाज के सदस्यों के साथ बात करते समय भी चलन में आती हैं।

इस प्रकार, धार्मिक परिपक्वता हमें अधिक शांतिपूर्ण भविष्य की ओर अग्रसर करती है।

Money | अर्थ या धन

इसका उद्देश्य धन संचय करना और व्यक्ति को आराम और विलासिता प्रदान करना है।

Desire | काम या इच्छा

इसका प्राथमिक उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है, कि घर और परिवार के सभी सदस्य अपने दिल की इच्छाओं को पूरा करें, जो प्रकृति में मौद्रिक रूप से उपस्थित नहीं हैं।

वास्तविक और अमूर्त इच्छाएं तभी प्रकट हो सकती हैं, जब वास्तु के अनुसार घर के कमरे शांति, सद्भाव और संतोष से भरे हों।

इस विषय पर अधिक जानने हेतु सेक्स और संबंधो में प्रगढ़न्ता ( sex ) भी अवश्य पढ़े।

Vastu tips for Modern home | घर के लिए वास्तु

किसी भी घर में कमरे अच्छी तरह हवादार, अच्छी तरह से प्रकाशित, उज्ज्वल और साफ-सुथरे होने चाहिए। यह नियम प्रत्येक कमरे के कोनों पर भी लागू होता है।

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घर के केंद्र में हमेशा एक खाली स्थान या दालान अवश्य होना चाहिए।

भारी फर्नीचर उदाहरण के लिए, अलमीरा को दक्षिण-पश्चिम की ओर मुंह करके रखना चाहिए। यदि आप डुप्लेक्स बनाने की योजना बना रहे हैं, तो इस दिशा में सीढ़ियां बनाना एक अच्छा विचार है।

बेडरूम में पौधों और पानी की विशेषताओं को रखने से बचें, जैसे पानी का फव्वारा, एक्वैरियम, या पानी को चित्रित करने वाली पेंटिंग।

वास्तु के अनुसार घर में अपने डाइनिंग एरिया को किचन के पास रखें, मेन डोर के पास नहीं।

वास्तु के अनुसार शयनकक्ष में दर्पण लगाने की सख्त मनाही है, जो उस कांच में सोते हुए जोड़े का प्रतिबिम्ब दिखता है। यदि आपके बेडरूम में दर्पण हो , तो सुनिश्चित करें कि यह बिस्तर को प्रतिबिंबित नहीं करता हो।

घर के लिए शुभ दिशा पूर्व या उत्तर या उत्तर-पूर्व होती है।

आपके घर के दरवाजे से आने वाली सकारात्मक ऊर्जा का उपयोग करने के लिए यहां कुछ रचनात्मक सुझाव :

1 भवन के प्रवेश द्वार पर एक बड़ा और मजबूत लकड़ी का दरवाजा होना चाहिए।

2 घर के प्रवेश द्वार के सामने डिब्बे, कचरा बैग और जूते नहीं रखे जाने चाहिए। इससे उत्पन्न होने वाली नकारात्मक ऊर्जा घर के लिए वास्तु अनुरूप नहीं होती है।

3 आपको यह सुनिश्चित करना चाहिए, कि मुख्य द्वार कमरे में अंदर की तरफ खुलता हो। इसके अलावा, दरवाजे के शोर को रोकने के लिए कब्ज़ों को तेल डालकर चिकना रखना चाहिए।

Drawing room | ड्राइंग रूम

घर में बैठक के लिए स्थान या कमरा जहां परिवार अपना अधिकांश समय एक साथ बिताता है, ड्राइंग रूम कहलाता है। वास्तु के अनुसार इसमें कुछ विशेष व्यवस्था होना चाहिए।

1 समृद्धि के लिए उत्तर या पूर्व की दिशा में मछली घर या एक़्वेरियम लगाना चाहिए।

2 एक उगते हुए सूर्योदय छवि से दक्षिणी दीवार को सजाना चाहिए।

3 दीवारों पर पीले, हरे, बेज या नीले रंग के रंग करना चाहिए, जो जीवन शक्ति और जीवंतता को दर्शाते हैं।

kitchen | रसोई घर

अपनी रसोई के वास्तु को बेहतर बनाने और अपने परिवार के स्वास्थ्य को सुनिश्चित करने के लिए,वास्तु अनुरूप निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए।

1 पानी के सिंक और गैस स्टोव के बीच एक सुरक्षित दूरी बनाए रखें।

2 फ्रिज को किचन के दक्षिण-पश्चिम कोने में रखें।

3 कभी भी अपने किचन का मुंह सीधे बाथरूम की तरफ न करें और न ही उसके साथ एक दीवार साझा करें।

4 खाना पूर्व दिशा की ओर मुख करके बनाये।

Bedroom | शयन कक्ष

बेडरूम आराम और विश्राम का स्थान होना चाहिए इसलिए यहाँ का शांतिपूर्ण माहौल बनाने के लिए दीवारों के सुखदायक रंगों के साथ पेंट करवाना बेहतर होता है।

1 मास्टर बेडरूम के लिए दक्षिण-पश्चिम दिशा सबसे अच्छी होती है।

2 कभी भी उत्तर दिशा में सिर करके नहीं सोना चाहिए।

3 अच्छे स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए, लटकते बीम वाले कमरों में रहने से बचें।

4 खोखले और ख़राब गद्दों या लोहे के बिस्तरों पर नहीं सोना चाहिए, इसके बजाय मजबूत लकड़ी के बिस्तर पर सोना बेहतर होता हैं।

Study Room | अध्ययन कक्ष

अध्ययन शाला एक ऐसी जगह होती है, जहां आपके बच्चे अपनी शिक्षा पर विचार करते है। अगर आपके पास एक अध्ययन कक्ष नहीं है, तो भी कुछ विशेष बातों का ध्यान रखें।

1 स्टडी टेबल चौकोर या आयताकार आकार ही चुनें।

2 स्टडी टेबल को इस तरह से व्यवस्थित करें, कि किसी को खाली दीवार या खिड़की का सामना न करना पड़े।

3 स्टडी टेबल के लिए उत्तर-पूर्व, पूर्व-पूर्व या पश्चिम-पश्चिम दिशा में रखें।

4 किताबों की अलमारी को दीवार पर लटकाना नहीं चाहिए ।

Conclusion | निष्कर्ष

ज़रूरी नहीं, कि आपका घर पूरी तरह से वास्तु के अनुकूल हो। हालाँकि, आप नकारात्मक ऊर्जाओं को मिटाकर और वास्तु दोषों (वास्तुकला और जीवन शैली की खामियों ) को दूर करके अपने घर को वास्तु अनुरूप कर सकते हैं।

अपने घर को दिशाओं और प्राकृतिक तत्वों के साथ संरेखित करें, और फिर खुद ही देख लीजिए फर्क आप स्वयं महसूस करेंगे।

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