योग ( yoga ) क्‍या है ? मन की वृत्तियों पर काबू पाना ही योग है। योग केवल आसन ही नहीं, आहार, व्यव्हार, अचार विचार के तालमेल से जीवन को सुन्दर बनाने का नाम ही योग है।

वर्तमान समय में योग को मानसिक एवं शारीरिक प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है, जिसका प्रचलन हमारे बीच शारीरिक और मानसिक व्यायाम के रूप में है।

अपितु यह पूर्ण रूप से गलत भी नहीं है, परन्तु यह सम्पूर्ण योग भी नहीं है। यह सम्पूर्ण प्रक्रिया का एक अंश मात्र है।

प्राचीन भारत में इस प्रक्रिया का प्रयोग शरीर और मन को नियंत्रित कर पूर्ण रूप से ज्ञान प्राप्ति के लिये निर्देशित करने के लिये किया जाता था।

जो दुख रूप संसार के संयोग से रहित है, तथा जिसका नाम योग है। हटठयोग, ध्यान योग, ज्ञान योग, सांख्य योग, कर्मयोग, भक्ति योग, प्रेमयोग के नाम सभी ने सुने होंगे।

ये सभी योग की विभिन्‍न प्रणालियां हैं। इनमें हठयोग व ध्यानयोग कुण्डलिनी जागरण के लिए अधिक उपयोगी हैं।

योग को मुख्यतः आठ भागो में वर्गीकृत किया गया है। यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, और समाधि।

आइये इन सभी भागो को विस्तृत रूप से समझने का प्रयास करते है।

Yamas the first step of yoga | प्रथम सोपान यम

योग द्वारा मन को शुद्ध व वश में रखने के लिए इनका पालन किया जाता है। सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य व अपरिग्रह यम के अंतर्गत आते है।

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जैसा कि कहा है, ‘ अहिंसासत्यास्तेय- ब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमा: ‘ इनका मन कर्म व वचन से पालन किया जाना चाहिए।

यम का निम्नलिखित बिंदुओं के आधार पर योग में वर्गीकरण और व्याख्या की गई है।

Non-violence | Ahimsa | अहिंसा

मन, कर्म तथा वचन से किसी प्राणी को ज़रा भी कष्ट न देना ‘अहिंसा’ है। अहिंसा केवल हम दूर रहना या हत्या आदि न करना ही नहीं है, अपितु किसी को भी कष्ट न देना अहिंसा है।

न तो कर्म द्वारा (शरीर से), न ही वचन द्वारा (वाणी से/गाली देना/धमकी देना आदि) न ही वचन द्वारा (अर्थात्‌ मन में भी ऐसा भाव नहीं आना चाहिए) ।

यदि मन, कर्म तथा वचन से 12 वर्षों तक अहिंसा का पालन किया जाए तो कोई साधक हिंसक नहीं रह सकता।

Truth | Satya | सत्य

ज्ञान या अनुभूति को बुद्धि द्वारा तौलकर जो अनुभव हो उसे ज्यों का त्यों प्रकट करना सत्य है। किन्तु उस प्रकटीकरण से किसी को दुःख नहीं होना चाहिए।

मन, कर्म व वचन से सत्य का पालन करना “सत्य’ है। न मुख से असत्य बोलें, न मन में कपट या धोखे का भाव आए और न ही शरीर द्वारा ऐसा कार्य हो।

Honesty | Astey | अस्तेय

अस्तेय योग का अर्थ है, ऐसे धन या सम्पदा को न लेना, जिस पर हमारा अधिकार न हो। जैसे किसी के स्वत्व का अपहरण करना।

चोरी, छल से ले लेना, ठगी, विवशता का लाभ उठा कर ले लेना, दलाली/ब्लेकमेल, भीख लेना, या पड़ी हुई वस्तु उठा लेना अथवा दूसरे की वस्तु बिना उसकी अनुमति लिए छेड़छाड़ या प्रयोग करना आदि।

यह सब स्तेय (चोरी) है। इसमें दूसरों की रचनाओं की चोरी, रिश्वत आदि सब शामिल हैं। इनको मन, कर्म और वचन से न करना ही अस्तेय है।

जो 2 वर्षो तक ऐसा योग कर लेता है, उसका सामान आदि कोई चुरा नहीं सकता।

Brahmacarya | ब्रह्मचर्य

बह्मचर्य का अर्थ योग में मन, वाणी और शरीर से होने वाले सभी प्रकार के मैथुनों का त्याग कर वीर्य की रक्षा करने से है।

जैसा कि कहा गया है, “कर्मणा मनसा वाचा सर्वावस्थासु सर्वदा। सर्वत्र मैथुन त्यागी ब्रह्मचर्य प्रचक्षते॥ “

मौखिक ( अश्लील वार्तालाप), नेत्रों द्वारा काम सुख लेना, कानों द्वारा, स्पर्श द्वारा काम सुख लेना तथा स्त्रियों का संग करना आदि सभी वर्जित हैं।

समस्त इन्द्रियों, मन आदि का इस विषय में पूर्ण संयम ही ब्रह्मचर्स है। बारह वर्ष तक इसका हर प्रकार से पालन करने और मन में ऐसी कल्पना भी न आने देने पर शरीर असीम शक्तिवाला हो जाता है।

किन्तु वीर्य क्षय किसी प्रकार भी (स्वप्न में भी) नहीं होना चाहिए। क्योंकि जैसा कि कहा गया है, “यावद्बिन्दु: स्थितो देहे तावन्भृत्यौर्भय कुतः। ” (जब तक शरीर में बिन्दु/वीर्य स्थित है, तब तक मृत्यु का भय कहां )

Aparigraha | अपरिग्रह

अपरिग्रह का अर्थ है संचय ना करना। अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए मोह ये पांचों यम ‘ब्रत’ भी कहे जा सकते हैं। यदि ये सार्वभौम स्थिति में हों तो “महाव्रत ‘ हो जाते हैं।

जैसा कि कहा भी है, जातिदेशकालसमयानवच्छिन्ना: सार्वभौमा महाब्रतम्‌॥ ( पांतजलयोगप्रदीप ) अर्थात्‌-जाति, देश, काल और निमित्त की सीमा से रहित, सार्वभौम हो जाने पर ये “महाव्रत’ हो जाते हैं ।

यमों का महाव्रत हों जाना पूर्ण सन्यासी हो जाने का लक्षण होता है।

Niyama the second step of yoga | द्वितीय सोपान नियम

यम यदि मन व इन्द्रियों की शुद्धि व आत्मा के उत्थान के लिए हैं, तो नियम शरीर व बुद्धि को शुद्ध कर व्यक्ति में ‘पात्रता’ उत्पन्न करने में सहयोगी हैं। योग के अंतर्गत ये भी पांच ही हैं।

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महर्षि पातज्जलि के अनुसार “शौचसंतोष तप: स्वाध्यायेश्व प्रणिधानानि नियमा:॥” अर्थात्‌-शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय व ईश्वरप्रणिधान ये पांच निमय हैं। इनके विषय में भी हमें थोड़ा विस्तार में जाना उपयुक्त होगा।

Shauch | शौच

शौच का अर्थ पूरी सफाई से है। शरीर की बाहरी व आतंरिक, वाणी, बुद्धि, विचार, मन, आत्मा, कर्म, साधनों तथा स्थान आदि की शुचिता ही शौच है।

शास्त्रानुकूल एवं सदकर्मों द्वारा कमाए गए शुद्ध भोजन को करना भी शुचिता के अन्तर्गत आता है। राग, द्वेष, क्रोध,
काम, ईर्ष्या, मद, लोभ, अहंकार आदि सब विकारों व मलों से शुद्ध कर लेना मन की शुचिता है।

पूर्ण शुचिता का पालन करने वाला ही पवित्र है। वही सदपात्र है। संतोष, कर्तव्यों का सजगता से पालन करना परन्तु अधिकार की इच्छा से मुक्त रहना।

कर्मों को सजगतापूर्वक करना, किन्तु फल की इच्छा से मुक्त रहना, अथवा कर्तव्यों और कर्मों के परिणाम स्वरूप या प्रारब्ध से जो भी, जितना भी मिल जाए।

जैसी भी परिस्थितियों में रहने का संयोग हो जाए उसी में प्रसन्‍न व संतुष्ट रहना। उससे अधिक की इच्छा न करना और कम की शिकायत न करना ही संतोष है।

संक्षेप में कामनाओं, तृष्णाओं तथा लालसाओं पर विजय पा लेना ही संतोष है। संतोष का पूर्ण पालन करने वाला ही समृद्ध व सम्पन्न है।

Tapas | तप

अपने आश्रम, वर्ण, योग्यता व परिस्थितियों के अनुसार स्वधर्म का पालन करना। आत्मोत्थान तथा कुसंस्कारों को कुचलकर नवीन व सदसंस्कारों की स्वयं में स्थापना करना।

इन प्रयासों में जो भी मानसिक या शारीरिक कष्ट प्राप्त हों उन्हें सहर्ष सहन करना तप है। व्रत, उपवास, साधना आदि तप योग के अन्तर्गत ही आते हैं।

तप द्वारा अन्तःकरण का शोधन होता है, तप द्वारा ही आत्मोत्थान होता है। योग्यताएं, क्षमता, शक्तियां, ज्ञान, सत्य और सुपात्रता की प्राप्ति होती है।

मन में पड़ी पुराने कुसंस्कारों को निकालने का प्रयास ही तप योग है। तप एक पैर पर खड़े रहना नहीं है। इस बात को समझें। जब हम मजबूरी में, कोई कार्य या श्रम करते हैं, तब वह दण्ड या सजा कहलाती है।

उससे कष्ट व दुःख होता है, किन्तु अपनी स्वेच्छा से, अनुशासन से प्रसन्‍तता पूर्वक हम स्वयं उसी क्रिया या श्रम को करते हैं, तब वह तप या साधना होती है।

Svādhyāya | स्वाध्याय

जिसके द्वारा कर्तव्य-अकर्तव्य का बोध हो सके ऐसी पुस्तकों, ग्रन्थों व शास्त्रों आदि का नित्य अध्ययन, उसका चिन्तन, मनन जीवन में उसका अमल ही स्वाध्याय है।

सद्‌ साहित्य को ही पढ़ा जाना चाहिए। पढ़कर गुना जाना चाहिए और फिर उसके निष्कर्ष को अपनाना
चाहिए।

Pranidhan | प्रणिधान

अपने अहं आदि का त्याग प्रणिधान योग है। जो होना है, वह होकर रहता है और जो नहीं होना है, वह कभी नहीं होता। किन्तु मनुष्य का अहं, स्वयं को भ्रमवश कर्ता मानकर सुखी या दुःखी होता रहता है।

गर्वित या पछताता रहता है, और जितना वह ऐसा करता है, उतना ही वह माया के दलदल में फंसता जाता है। प्रायः व्यक्त सफलता का श्रेय अपने को, अपनी बुद्धि व दूरदर्शिता को अपने प्रयासों को देता है।

किन्तु असफलता का कारण वह सदैव भाग्य को ठहराता है। अपनी भूलों या त्रुटियों को नहीं। जबकि तत्त्वत: वह न तो सफलता के लिए जिम्मेदार है, न ही असफलता के लिए।

जैसा कि कहा गया है, हानि लाभ, जीना मरना, जय-पराजय, सफलता, असफलता, बदनामी ख्याति आदि सब विधि के हाथ होते हैं।

मनुष्य युद्ध कर सकता है, उसी पर उसका अधिकार है। किन्तु जीत या हार पर उसका कोई अधिकार नहीं है। इसीलिए बुद्धिमान जन अचिंत की चिंता नहीं करे। अचिंत यानि जो हमारी सामर्थ्य से परे है।

Asana the third step of yoga | तृतीय सोपान आसन

शरीर को निरोग, चुस्त व शक्ति सम्पन्न बनाए रखने के लिए योग में आसनों की (प्रमुख 84) उनके भेदों व उपभेदों सहित व्यवस्था की गई है।

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ऋषियों ने प्रकृति, पशु, पक्षी आदि के स्वभाव का अध्ययन कर आसनों व मुद्राओं का निर्माण किया। आसनों के मूल प्रवर्तक तो स्वयं भगवान शिव हैं।

जिन्होंने 84 लाख योनियों के आधार पर 84 लाख आसन बनाए थे। किन्तु संख्या में अत्यधिक हो जाने पर उनमें प्रमुख 84 आसन छांट लिए गए।

योग विदों ने उन 84 आसनों में भी प्रमुख रूप से उपयोगी दो आसन छांट लिए। जिनमें एक सिद्ध व दूसरा पद्म आसन है।

इन्हीं के अन्तर्गत स्थूल यौगिक व्यायामों और सूक्ष्म यौगिक क्रियाओं ( षट्कर्म/धौति, नौली, नेति, कुंजल, बस्ति, शंख प्रक्षालन आदि ) को भी ले लेते हैं, जो शारीरिक अवयवों और प्रमुख संस्थानों की भीतरी शुद्धि करती है।

योग में आसन की आवश्यकता बैठकर ध्यान करने के लिए पड़ती है। ताकि एक ही मुद्रा में सुखपूर्वक, बिना हिले-डुले दीर्घकाल तक बैठा जा सके और थकान आदि के कारण एकाग्रता या ध्यान भंग न होने पाए।

आसनों में पद्मासन, सिद्धासन, समासन, स्कास्तिकासन, वज्रासन, गौमुखासन, अर्ध-पद्मासन तथा सरलासन आदि प्रमुख हैं। इन आसनों के साथ मुख्य रूप से ‘ मूलाधार बन्ध’ लगाना अनिवार्य होता है।

आवश्यकतानुसार उड्डियान बन्ध तथा जालंधर बंध भी लगाए जाते हैं। बिना मूलाधार बन्ध लगाए ‘कुण्डलिनी जागरण का प्रयास निरापद नहीं होता।

इसमें कुण्डलिनी के जागृत होकर ऊपर उठंने के आघात से वीर्य या मूत्र निकल जाने की तीव्र आशंका रहती है। अतः मूलाधार बन्ध अवश्य लगाना चाहिए।

योग द्वारा कुण्डलिनी जागरण से सम्बंधित ज्ञान के लिए और उससे सम्बंधित रहस्यों को जानने के लिये kundalini लिंक पर जाये।

ध्यान के लिए किसी भी आसन को चुनें, किन्तु मेरुदण्ड और गर्दन सीधी रहे, इस विषय में सतर्क रहें। कमर में झोल या गर्दन में झुकाव का रहना न केवल आपको शीघ्र थका देगा, बल्कि आपका शारीरिक गठन भी बिगाड़ देगा।

योग में आसनो के साथ बंध भी लगाना आवश्यक है। मुख्यतया तीन प्रमुख बंधो का विवरण निम्न प्रकार से है।

Mulbandha | मूलबन्ध

इसे मूलाधार भी कहते हैं। मूल (जड़/आधार) में यह बन्ध लगाया जाता है। सभी बन्धों में प्रथम (मूल/आधारभूत) बन्ध यही है।

अत: इसे मूलाधार बन्ध कहते हैं। इस बन्ध में जननेन्द्रिय, गुदा तथा ‘सीवन’ (जननेन्द्रिय एवं गुदा के मध्य का भाग) की मांसपेशियों को ऊपर या भीतर की ओर आकर्षित/संकुचित किया जाता है।

जिस प्रकार मल त्याग की क्रिया के समय मल के विसर्जित होने के साथ ही स्वत: ही गुदा की मांसपेशियों में संकोचन होता है। इस संकुचन को कस कर अधिक से अधिक समय तक स्थिर रहना ही ‘बन्ध’ है।

इस बन्ध का अभ्यास ब्रह्मचर्य में भी सहायक होता है तथा वीर्य को ऊर्ध्वमुखी करता है। स्तम्भन सामर्थ्य को भी बढ़ाता है।

“सिद्धासन’ में बाएं पैर की एड़ी इस “बन्ध’ को ढीला पड़ने से रोकती है, तथा इस बन्ध के स्थाई व दीर्घकालिक होने में काफी सहयोगी होती है।

इसी विशेषता के कारण इस आसन का नाम ‘सिद्धासन’ रखा गया है।

Uddiyan Bandha | उड़ियान बन्ध

इस बन्ध में नाभि प्रदेश को भीतर की ओर खींच कर रखा जाता है। पेडू, नाभि तथा नाभि से ऊपर के भाग को भीतर की ओर अधिकाधिक समय तक आकर्षित रखा जाता है।

किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि सांस को भी रोकना है या छाती को अकड़ा लेना है। जैसा कि हर बन्ध का नियम है।

सम्बन्धित भाग को आकर्षित/संकुचित रखते हुए शरीर को ढीला रखना होता है। मूलाधार में भी जननांगों व गुदा प्रदेश को संकुचित करके शेष शरीर ढीला रखा जाता है।

Jalander bandha | जालंधर बन्ध

जालन्धर बन्ध में ठोड़ी को नीचे दबाते हुए कंठकूप में लगाने का प्रयास किया जाता है। किन्तु गर्दन आगे को नहीं झुकनी चाहिए।

ठोड़ी को कंठकूप में स्थापित करने से गर्दन की लम्बाई आगे की ओर से कम होती है, तथा उस स्थान व आसपास के नाड़ी जाल पर बन्ध लग जाता है।

अत: इस बंध को ‘जालन्धर बन्ध’ कहते हैं। इस बन्ध में भी सम्बन्धित प्रदेश के अलावा शेष शरीर को ढीला रखा जाता है।

Pranayama the fourth step of yoga | चतुर्थ सोपान प्राणायाम

श्वांस प्रश्वांस गति को रोक लेना/ठहरा लेना ही प्राणों का आयाम यानी प्राणायाम कहा जाता है। श्वांस प्रश्वांस की गति को रोकना अथवा नियंत्रित करना ही प्राणायाम है।

पर प्रश्न उठता है कि श्वांस-प्रश्वांस की गति को रोकना/प्राणायाम करना योग में क्यों आवश्यक है ? इसका क्या लाभ है ?

पहला और सामान्य लाभ तो यही है, कि आयु की वृद्धि होती है। साधको के मतानुसार कम खाना तथा गहरी सांसें लेना अथवा उनका आयाम करना (स्तंभन) आयु को बढ़ाने वाला होता है।

इसके अलावा केन्द्रियकरण क्षमता, विचारशीलता, विश्लेषणात्मक शक्ति, दूरदर्शिता, निरीक्षण क्षमता, बुद्धि, स्मृति तथा शांति का विकास होता है।

मन से अधीरता, व्यग्रता, चंचलता व अस्थिरता के भाव दूर होकर स्थिरता व शांति का उदय होता है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह कि प्राणों को वश में करने से मन वश में आता है।

मन पर अपनी नियंत्रण शक्ति बढ़ती है, क्योंकि प्राण व मन का गहन सम्बन्ध होता है। मन को वश में कर पाना अत्यंत दुष्कर है। किन्तु प्राण को वश में करना अपेक्षाकृत सरल है।

अतः प्राण वश में करने से मन वश में आता है। मन को वश में करने से प्राण वश में आते हैं। क्योंकि दोनों सूक्ष्म स्तर पर अति गहन रूप से परस्पर सम्बन्धित होते हैं।

जब मन उद्धिग्न, बेचैन, भयभीत, परेशान, घबराया हआ, अशांत, अस्थिर या कामातुर होता है। तब सांसों की गति भी तीव्र होती है, किन्तु सांसों की गति को नियमित करते ही मन में स्थिरता व शांति का भाव आ जाता है।

प्राणायाम के मुख्य तीन भेद रेचक, पूरक एवं कुम्भक हैं। श्वांस को फेफड़ों में शनै: शनै: पूरा भरना और उसे नाभि तक ले जाना “पूरक ‘ कहलाता है।

श्वांस को वहीं रोके रखना ‘कुम्भक’ ( आन्तिक कुम्भक) कहा जाता है। श्वांस को शनै:-शनै: बाहर बाहर छोड़ते हुए, फेफड़ों को बिल्कुल खाली कर देना ‘रेचक ‘ कहा जाता है।

पुनः श्वांस को शरीर से बाहर ही रोके रखना (नवीन श्वांस का न लेना) ‘कुम्भक’ (बाह्य कुम्भक) कहलाता है। इसे प्रणवात्मक कहा जाता है, क्योंकि इसमें प्रणव का उच्चारण स्वत: ही होता रहता है।

Pratyahara the fifth step of yoga | पंचम सोपान प्रत्याहार

पंच ज्ञानेन्द्रियों के रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द यह पांच विषय हैं। इन्द्रियों को सयमित रखना, सभी इन्द्रियों को उनके विषयों से रोकना अथवा पृथक कर लेना ही प्रत्याहार है।

मन यदि सजग न होगा तो इन्द्रिय रूपी शक्तिशाली किन्तु उछंंखल घोड़े अपने-अपने विषयों की ओर आकर्षित होकर दौड़ने लगेंगे।

अत: मन रूपी सारथी को बुद्धि रूपी लगाम से इन्द्रिय रूपी घोड़ों को वश में रखना पड़ता है। मन व इन्द्रियों में संगति अथवा एकरूपता या सामंजस्य होना आवश्यक है।

अत: इन्द्रियों को उनके विषयों से रोकना और उन्हें मन के अनुकूल बना लेना योग मार्ग के लिए ही नहीं, समस्त सफलताओं, कल्याण और प्रगति के लिए भी अत्यन्त आवश्यक है।

चंचल मन को प्राणायाम द्वारा स्थिर किया जाता है, किन्तु चंचल इन्द्रियां प्रत्याहार द्वारा वश में आती हैं। इन्द्रियां यदि वश में न हों तो स्थिर हो चुका मन भी भटक जाता है, और पुन: चंचल हो जाता है।

अनुकूल विषयों के प्रति उत्सुक/लालायित न होने तथा उनके रसास्वादन में मन को रमने न देना और प्रतिकूल विषयों से भागने का प्रयास न करना।

अनुकूलता या प्रतिकूलता, सुख या दु:ख दोनों ही स्थितियों में सम रहना ही इन्द्रियों का प्रत्याहार है।

Dhāraṇā the sixth step of yoga | छठा सोपान धारणा

जिस योगी का चित्त वायु के साथ सुषुम्ना में प्रवेश कर जाता है, उस योगी को पंचमहाभूतों की धारणा हो जाती है।

मन द्वारा किसी विचार, सत्ता या पंचमहाभूत आदि को धारण कर लेना ही धारणा है। यह ध्यान की पूर्वावस्था अपितु भूमिका कही जा सकती है।

क्योंकि ध्यान कहां लगाना है, इस विषय को निश्चित कर संकल्प से धारण कर लेना ही धारणा है। धारणा के द्वारा मन को विभिन्‍न विषयों या कल्पनाओं को धारण कराया जा सकता है।

अपने ध्यान को परिपक्त्र करने के लिए अपनी रुचि के अनुसार विषय या कल्पना को धारण किया जाता है।

जैसा कि माता बालक से इच्छित कार्य कराने के लिए मिठाई, खिलौने आदि का लोभ देकर बालक का ध्यान इच्छित कार्य में लगाती है।

उसी प्रकार मन के इच्छित या रुचिकर विषय अथवा कल्पना का मन को धारण कराकर उसे केन्द्रित कर ध्यान की ओर लाया जाता है।

इसीलिए एक सौ बारह प्रकार की धारणाओं का विधान है, क्योकि बिना किसी भी धारणा के ध्यान सम्भव नहीं होता। भले ही शून्य या अनन्त की ही धारणा क्यों ना की जाएं।

कष्ट, पीड़ा या दर्द, यौन सुख, प्रेम की प्रगाढ़ता, संगीत, शब्द या स्पर्श आदि के माध्यम से भी मन को केन्द्रित कर ध्यान की ओर लाया जाता है।

शून्य में, परमात्मा में, विभिन्‍न चक्रों पर, किसी बिन्दु पर, चित्र, मूर्ति या विचार पर भी मन का केन्द्रियकरण होता
है।

अत: पंचमहाभूतों के माध्यम से भी मन को केन्द्रित किया जा सकता है। केन्द्रीयकरण के लिए सैकड़ों विषय या कल्पनाएं सम्भव हैं।

किसी का भी अपनी रुचि व सुविधा के अनुसार चयन किया जा सकता है, और मन को उसी कल्पना या विषय को धारण करवा कर ध्यान लगाया जा सकता है।

Meditation the seventh step of yoga | सातवा सोपान ध्यान

जो धारणा की जाए, अथवा चित्त/मन को जहां पर लगाए जाए वहीं/उसी में वृत्ति का एकतार होकर चलना या वहीं पर मन का लगे रहना ही ध्यान या एकाग्रता कहा जाता है।

चित्त में दूसरी वृत्ति/भाव का उत्पन्न न होना अपितु धारणा या ध्येय पर एक ही वृत्ति का जो धारण की गई हो उसका ही प्रवाहमान रहना।

चित्त का उसी विषय/धारणा पर एकाग्र हो जाना और उस एकाग्रता का देर तक भंग न होना, या दूसरी वृत्ति द्वारा बाधित न होना ही ध्यान है।

यह ध्यान सगुण/साकार और निर्गुण/निराकार दो प्रकार का होता है। सगुण रूप का ध्यान अणिमादि सिद्धियों को प्राप्ति कराता है, जबकि निर्गुण का ध्यान समाधि की प्राप्ति कराता है।

Samadhi the eighth step of yoga | आठवा सोपान समाधि

जब ध्यान में केवल ध्येय मात्र की ही प्रतीति रह जाती है, और चित्त का निजस्वरूप शून्य सा हो जाता है। तब वह ध्यान ही समाधि हो जाता है।

जब तक कान आदि पांचों ज्ञानेन्द्रियों में उनके शब्द आदि विषयों का किंचित अंश भी विद्यमान रहता है, तब तक साधक ध्यानावस्था में रहता है।

किन्तु जब पांचों ज्ञान इन्द्रियों की वृत्तियां निःशेष भाव से आत्मा में लीन हो जाती हैं। तब समाधि की अवस्था हो जाती है।

दूसरे शब्दों में समाधि को हम ध्यान की परिपक्व, प्रगाढ़ या चरम स्थिति कह सकते हैं। इस स्थिति में ध्यान करने वाला, ध्यान तथा जिसका ध्यान किया जा रहा है, का अन्तर समाप्त होकर केवल ध्येय अथवा स्वविस्मृति हो जाती है।

ध्यान ज्ञानेन्द्रियों के विषयों द्वारा, बाह्य विष्नों द्वारा अथवा आन्तिरिक विक्षोभ से भंग हो जाता है। ध्यान में स्व
स्मृति व ध्याता, ध्यान व ध्येय का अन्तर बना रहता है।

ध्यान की अवधि कम होती है, जबकि समाधि में सब स्मृति व अन्तर समाप्त होकर मात्र ध्येय की प्रतीति रहती है, और समाधि की अवस्था स्थाई व दीर्घ होती है।

ध्यान करता हुआ साधक, किसी के द्वारा हुए जाने, पुकारे जाने, उठाए जाने, किसी तीब्र गंध को सूंघकर या तीत्र शब्द आदि को सुनकर अंस्थिर या विश्षुब्ध हो जाने से ध्यान भंग कर लेता है।

अवस्था में भी उसे ‘स्व’ का बोध या “मैं चिन्तन अथवा ध्यान कर रहा हूं’ अनुभूति बनी रहती है। पर समाधि में साधक इन सब स्थितियों से ऊपर उठ जाता है।

दूसरे लोगों के लिए मृतप्राय: या अत्यंत प्रगाढ़ निद्रा में लीन प्रतीत पड़ता है। किन्तु वास्तव में वह ध्यान की
पराकाष्टा में पहुंच कर समस्त दैहिक व्यापारों व स्वबोध को भूल जाता है।

Conclusion | सारांश

यहाँ इस लेख में सामान्य परिचय दिया गया है। आने वाले अन्य लेखो में योग से सम्बंधित प्रत्येक भाग के विषय में विस्तृत जानकारी प्राप्त कर सकेंगे।

आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान व समाधि योग के यह 6 अंग कहे जाते हैं। वैसे देखा जाए तो प्रारम्भ के दो अंग यम व नियम प्रत्यक्ष रूप से योग से सम्बन्धित हैं भी नहीं । किन्तु अप्रत्यक्ष रूप से वे अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।

वे योग मार्ग की भूमिका हैं और योगी में पात्रता उत्पन्न करने में अत्यंत उपयोगी हैं। इसीलिए योग के 8 अंग माने गए है।

ध्यान अथवा धारणा सामान्य रूप से भी जीवन में विभिन्‍न अवसरों पर कमज्यादा प्रयोग में आते रहते हैं, भले ही सम्पूर्णता के साथ नहीं।

इनके लिए आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, यम, नियम आदि की आवश्यकता नहीं होती। किन्तु योग मार्ग के लिए इन सभी अंगों की अनिवार्यता रहती है।

क्योंकि इन्हीं से ‘पात्रता’ उत्पन्न होती है। इन्हीं से शुद्धता और शक्ति को संभालने की सामर्थ्य उत्पन्न होती है। यद्यपि बहुत से विद्वानों ने योग को षडांग (छह अंगों वाला) कहा है।

शुरू के दो अंग जो यम और नियम महर्षि पातञ्जलि आदि ने माने हैं, गुरु गोरखनाथ आदि ने नहीं माने हैं।

यंत्रो और चक्रो के मध्य सम्बन्ध तथा चक्रो के बारे में विस्मयकारी जानकारी के लिये Chakras पर क्लीक करे। उनके रहस्यों, उन्हें जाग्रत करने की विधि और मानव जीवन में पड़ने वाले प्रभाव को जाने।

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