योग में सभी के लिए प्राणायाम (Pranayama ) ही सबसे अधिक कौतुहल का विषय होता है, और हो भी क्यों न सभी योगिक क्रियाओ में इसका एक विशेष स्थान है।

प्राणायाम के नित्य अभ्यास को पाप रूपी ईंधन को भस्म करने वाले अग्नि के समान तथा भवसागर से पार उतारने वाले महासेतु के समान कहा जाता है।

यही कारण है, कि योग में सम्मिलित होने पर भी अलग से लिखने की आवश्यकता पड़ी। ताकि विषय की गहराई तक विस्तार दिया जा सके।

कुण्डलिनी का सम्बन्ध प्राण से है और प्राण का मन से। अत: कुण्डलिनी जागरण का सर्वप्रथम, प्रामाणिक, सरल व निश्चित उपाय प्राणायाम ही है।

शरीर, मन आदि को जिस प्रकार शुद्ध, पवित्र करना आवश्यक है, उसी प्रकार कुण्डलिनी जागरण के मार्ग पर पहला पड़ाव उपर्युक्त नाड़ियों का शोधन है।

जिससे प्राण व कुण्डलिनी का पथ निर्बाध व निर्विकार हो सके। इस विषय में प्राणायाम ही उपयोगी सिद्ध होता है।

शरीर को वज्र बनाने के लिए बुद्धि व मन को समर्थ बनाने के लिए आयुवृद्धि व रोग नाश के लिए, स्फूर्ति, स्वास्थ्य व प्रफुल्लता के लिए।

सर्दी गर्मी से शरीर की रक्षा के लिए, भूख प्यास की शान्ति के लिए, कुण्डलिनी जागरण के लिए तथा नाड़ी शोधन के लिए अलग-अलग प्रकार के प्राणायाम उपयोगी होते हैं।

पूर्ण रूप से प्राणायाम को समझने के लिये पहले योग के बारे में जानकारी होना आवश्यक है। अतः योग ( yoga ) पर क्लीक कर योग सम्बंधित जानकारी प्राप्त करे।

Kundalini and Pranayama | कुण्डलिनी और प्राणायाम

दो मुहूर्त तक सरस्वती का चालन करके सुषुम्ना नाड़ी को, जो कुण्डलिनी के सर्वाधिक निकट होती है, किंचित ऊपर की ओर खींचें।

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इस इस प्रकार अभ्यास करने से कुण्डलिनी सुषुम्ना के मुख में चढ़ने लगती है, और साथ-साथ प्राण भी स्वयं ही उस स्थान को छोड़ सुषुम्ना में चढ़ने लगता है।

मोक्षद्वार खोलने के लिए प्राणशक्ति को सुषुम्ना में प्रविष्टठ कराना आवश्यक है। इस प्रकार कुण्डलिनी को चलाने के दो ही प्रमुख साधन माने गए हैं–सरस्वती चालन और प्राणनिरोध/प्राणायाम।

शक्ति आठ प्रकृति स्वरूपा होकर आठ कुण्डल धारण किए हुए पड़ी रहती है। कुण्डलिनी के दो मुख होते हैं। एक मुख से वह सुषुम्ना के रुध्र में इड़ा व पिंगला नाड़ी में लपेटा लगाए हुए साढ़े तीन कुण्डलों के साथ सुप्त अवस्था रहती है।

दूसरा मुख सदैव-क्रियाशील व जागृत रहता है। इसी मुख से जीव को चेतना व ब्रह्मज्ञान प्राप्त होता है। परन्तु पहले मुख के निष्क्रिय व सुप्त रहने के कारण व्यक्ति आत्मज्ञान या ब्रह्मसाक्षात्कार करने में असमर्थ होता है।

जिस द्वार से जाने पर ब्रह्मद्वार की प्राप्ति होती है, उसी द्वार पर यह परमेश्वरी सोई पड़ी रहती है। वायु या अग्नि के संयोग से प्राण निरोध या सरस्वती चालन से जागृत हो जब यह ऊपर चढ़ने लगती है, तभी वह सिद्धित्व मोक्ष देने वाली होती है।

सुप्त कुण्डलिनी सर्पाकार और कमल नाल के तन्तुके समान होती है, वह अग्नि के संयोग से जागृत्‌ होकर सुषुम्ना के रास्ते ऊपर चढ़ती है।

प्राणायाम द्वारा कुण्डलिनी जागरण से सम्बंधित ज्ञान के लिए और उससे सम्बंधित रहस्यों को जानने के लिये kundalini लिंक पर जाये।

अनेक योगग्रंथो में 8 प्रकारके प्राणायाम कहते हैं। बहुत से योगशास्त्र प्राणायामों की संख्या बारह बताते हैं। उपयोगी प्रमुख प्राणायाम निम्नलिखित हैं।

Nadi ShodhanaPranayama | नाड़िशोधक प्राणायाम

शरीर में स्थित 72000 नाड़ियों में दस नाड़ियां अत्यंत प्रमुख हैं | क्योंकि ये प्राणवाहक नाड़ियां हैं। इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना, गान्धारी, हस्तजिह्वा, पूषा, यशस्विनी, अलम्बुषा, कुहू और शंखिनी।

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नाभि के नीचे इन सभी नाड़ियों का मूलस्थान माना गया है। बहत्तर हजार में 72 मुख्य हैं। उन 72 में भी उपर्युक्त दस प्रमुख हैं, और इनमें भी प्रथम तीन तो परम महत्त्व वाली हैं।

नासिका के बाएं भाग में इड़ा, दाएं में पिंगला, इन दोनों के मध्य में सुघुम्ना है। बाईं आंख में गान्धारी, दाईं आंख मेंहस्तजिह्वा, दाएं कान में पूषा, बांए कान में यशस्विनी, मुख में अलम्बुषा, लिंग देश में कुह्द, मूल स्थान में शंखिनी स्थित है।

यह दस प्रमुख प्राण वाहक नाड़ियों के स्थान हैं। इनमें सुषुम्ना परातत्त्व में लीन है। इसी को सरस्वती भी कहा जाता है, तथा बह्म स्वरूप है। क्योंकि यही कुण्डलिनी शक्ति का मार्ग बनती है।

प्राणायाम में इड़ा व पिंगला नाड़ियों का प्रयोग होता है। अत: यह तीनों परममहत्त्व वाली हैं। इन तीनों नाड़ियों का संगम आज्ञाचक्र पर होता है।

शरीर, मन आदि को शुद्ध, पवित्र करना आवश्यक है, उसी के मार्ग पर पहला पड़ाव उपर्युक्त नाड़ियों का शोधन है।

शरीर को वज्र बनाने के लिए बुद्धि व मन को समर्थ बनाने के लिए, आयुवृद्धि व रोग नाश के लिए, स्फूर्ति, स्वास्थ्य व प्रफुल्लता के लिए

सर्दी गर्मी से शरीर की रक्षा के लिए, भूख प्यास की शान्ति के लिए, नाड़ी शोधन के लिए अलग-अलग प्रकार के प्राणायाम उपयोगी होते हैं।

Chandrang Suryang Pranayama | चन्द्रांग सूर्यांग प्राणायाम

बद्ध पद्यासन लगाएं। मूलाधार बन्ध तथा उड्डियान बन्ध लगाएं चन्द्रनाड़ी (बाएं नथुने) से पूरक करें। फिर जालन्धर बन्ध लगा कर यथाशक्ति कुम्भक करें |

तब जालन्धर बन्ध खोल कर सूर्य नाड़ी से (दाएं नथुने से) रैचक करें | फिर यही क्रिया विपरीत क्रम से दुहराएं। अर्थात्‌ सूर्य नाड़ी से पूरक करें और कुम्भक के बादचन्द्रनाड़ीसे रेचक करें।

चन्द्र नाड़ी से पूरक करते समय श्वेतवर्णीय अमृत स्वरूप चन्द्रमा का ध्यान करें। सूर्य नाड़ी से पूरक करते समय तेजोमय सूर्य मंडल का ध्यान करें |

इस प्रकार चन्द्र व सूर्य का ध्यान करते हुए बार-बार यही क्रम दोहराते हुए प्राणायाम करने से नाड़ी शोधन व सुख होता है ।

Chandrang Pranayama | सूर्यांग प्राणायाम

बद्ध पद्यासन में योगी प्राण का चन्द्र से पूरक करे। यथा शक्ति उसे धारण कर सूर्य से रेचक करे | तब अमृतमयी दही व दूध के समान उजले चन्द्रबिम्ब का ध्यान करें। इससे प्राणायाम करने वाला सुखी होता है।

Suryang Pranayama | सूर्यांग प्राणायाम

दाएं से श्वास को शनै: शनै: पूरक करें। चिर विधान पूर्वक कुम्भक कर चन्द्र से रेचक करें। तब प्रज्वलित देदीप्यमान ज्वालापुज्ज सूर्य मण्डल का ध्यान नाभि प्रदेश में करने से योगी/प्राणायामी सुखी होता है।

इस प्रकार दोनों अंगों को मिला कर जार-बार यह प्राणायाम करने से सुख व नाड़ी शोधन होता है।

DusaraNadi shodhanaPranayama | दूसरा नाड़ी शोधक प्राणायाम

दाएं हाथ से नासापुरों को दबाकर पहले सारा वायु बाहर निकालें। फिर बाएं नासापुट से शनै: शनै: सोलह मात्रा से वायु को भीतर खींच कर, चौंसठ मात्रा से कुम्भक करें और बत्तीस मात्रा से पिंगला (सूर्य/दायां नथुने) के द्वारा उसे बाहर निकालें

तत्पश्चात्‌ विपरीत क्रम से (यानि दाएं से सांस लेकर बाद में बाएं नथुने से निकालना) इसे दुहराएं। ऐसा करने से समस्तदसों नाड़ियां वायु से भर जाती हैं, और नाड़ी शोधन होता है

यहां ध्यान देने की बात यह है कि जितने समय या मात्रा में श्वांस लेना है, उससे दुगुने में निकालना है, और जितने में निकालना है, उससे दुगुने में रोकना है।

इस प्रकार दायें नथुने से 2अधिकाधिक प्राणवायु नाड़ियों को भर पाती है तथा समुचित समय तक उनमें विचर पाती है, और अधिक से अधिक अशुद्ध वायु बाहर निष्कासित कर पाती है।

मात्राओं को घड़ी द्वारा सैकण्ड्स में नापा जा सकता है। अथवा प्रणव मंत्र ऊं के 46, 64 व 32 बार मन ही मन उच्चारण करके निश्चित समय पूर्ण किया जा सकता है।

स्मरणीय तथ्य यह है, कि नाड़ी शोधन प्राणायाम बद्धपद्मासन लगाकर ही किए जाते हैं। यहां बताए गए दोनों प्राणायामों में से कोई एक कम-से-कम तीन महीने तक करना चाहिए। तब समस्त नाड़ियों का समुचित शोधन होता है।

Benifits of Nadi shodhanaPranayama | नाड़िशोधक प्राणायाम के लाभ

नाड़ियों के शोध से यथेष्ट मात्रा में प्राणवायु को धारण करने की सामर्थ्य उत्पन्न हो जाती है। जठराग्नि प्रदीस होकर आरोग्य प्राप्त होता है और नाद स्पष्ट सुनाई देता है।

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जब नाड़ी शोधन हो जाता है, तब उसके बाह्य लक्षण स्पष्ट दिखाई देने लगते हैं । काया कृश हो जाती है, और शरीर कान्तिमय हो जाता है।

प्राणायाम की साधना में शरीर को पतला या हल्का होना सफलता का लक्षण है। शरीर की चर्बी को दूर कर प्राणायाम शरीर को हल्का व कृश बनाता है।

क्योंकि स्थूलता व गुरुता (भारीपन) आलस्य, प्रमाद, तन्द्रा, शिथिलता, दीर्घ॑सूत्रता, निद्रा, बहुभोजी होना रोगों को बढ़ाता है। तमोगुण में वृद्धि करता है।

हल्का व पतला शरीर, प्रसन्न फुर्तीला, सत्त्वमय रहता है। जिससे तेज या कांति में वृद्धि होती है और शरीर तप व साधना में समर्थ होता है।

प्राणायामों का तथा अन्य योग साधनाओं का अभ्यास करने से पूर्व प्रारम्भ में नाड़ी शोधक प्राणायाम से ही साधनान्ना आरम्भ करनी चाहिए।

बिना नाड़ियों को शोधन किए किया गया प्राणयाम व ध्यान पूर्ण लाभ नहीं देता तथा विकार ग्रस्त कर सकता है।

Ajapa Gayatri Pranayama | अजपा गायत्री प्राणायाम

अजपा गायत्री को हंस गायत्री भी कहते हैं। यद्यपि ‘हंस’ शब्द का प्रयोग आत्मा के पर्याय स्वरूप होता है। आत्मा जब देह छोड़ती है, तो प्राण भी देह छोड़ता है।

श्वांस-प्रश्वांस क्रिया में प्राण जब बाहर जाता है, तब ‘सकार’ की ध्वनि करता है, और अपान जब भीतर आता है, तब ‘ हकार’ की ध्वनि करता है।

इस प्रकार मनुष्य श्वांस प्रक्रिया के साथ अनजाने में ही हंस गायत्री (सो5हं या हंस: ) का उच्चारण करता रहता है। जिसका अर्थ है ‘वो मैं हूं’ या ‘हूं मैं वो’।

इस प्रकार स्वयं को (आत्मा) परम का (परमात्मा) अंश वह अनजाने में ही स्वीकारता रहता है। अनजाने में जाप होते रहने से ही इसे ‘ अजपा गायत्री ‘ भी कहा जाता है।

इस प्रकार एक दिन में जीव इक्कीस हजार छह सौ हंसमंत्र ( औसतन) जपता है। अजपा गायत्री को ध्यान में रख कर प्राणायाम करने पर ज्ञान व मोक्ष प्राप्त होते हैं।

प्राण नासिका से बारह उंगल की दूरी तक बाहर जाकर गतिहीन हो जाता है और अपान हृदय से बारह अंगुल नीचे तक आकर रुक जाता है।

प्राणायाम के अभ्यास से यह दूरी तिगुनी (36 अंगुल) तक बढ़ाई जा सकती है। इससे अधिक दूर गया प्राण फिर वापस नहीं लौटता। यह एक प्राणायाम के उच्च अभ्यासों में रखी जाने वाली सावधानी भी है।

प्राणायाम रूप हंस बाएं व दाएं मार्ग से 36 अंगुल बाहर निकलता है, अत: वायु को ही प्राण कहते हैं। मल से भरी नाड़ियों के चक्र का शोधन होता है। अत: योगी को प्राण वायु को ग्रहण करने का अभ्यास करना चाहिए।

Trividhi Pranayama | त्रिविधि प्राणायाम

बारह मात्रा युक्‍त प्राणायाम रेचक, पूरक व कुम्भक तीन प्रकार का होता है। तीनों को मिलाकर करने से त्रिविधि प्राणायाम होता है।

त्रिविधि प्राणायाम को क्रमशः अंधम, मध्यम व उत्तमतीन प्रकार का माना गया है। अधम प्राणायाम में पूरक 12 प्रणव से, कुम्भक 16 प्रणव से और रेचक 10 प्रणव से किया जाता है।

मध्यम प्राणायाम में पूरक 24 प्रणव से, कुम्भक 32 प्रणब से और रेचक 20 प्रणव से किया जाता है (यानि मात्राएं या प्रणव दुगुने हो जाते हैं)।

जबकि उत्तम प्राणायाम में पूरक 36 प्रणव से, कुम्भक 64 प्रणव से और रेचक 40 प्रणब से किया जाता है।

उत्तम प्राणायाम में दक्षता, शरीर को लघुता/हल्कापन देती है और योगी के ऊपर उठते ही उसकी देह का ही नहीं, मन आत्मा का भी उत्थान होता है।

मध्यम प्राणायाम में पूरक 24 प्रणव से, कुम्भक 32 प्रणब से और यह प्रणवात्मक होता है। पूरक चन्द्र नाड़ी से व रेचक सूर्य नाड़ी से करें। इसे त्रिविधि प्राणायाम या प्रणवात्मक प्राणायाम कहते हैं

क्योंकि प्रणण (35%) के अ+उ+म्‌ (ब्रह्मा, विष्णु, शिव अथवा-रज्ञान, क्रिया व संकल्प या सूर्य, अग्नि व चन्द्र) की तीन मात्राएं ही पूरक, कुम्भक व रेचक में रहती हैं।

इस प्राणायाम के साथ मन ही मन ओम का जाप करना चाहिए और प्राण व अपान का निरोध कर श्वांस को सुषुम्ना में चढ़ाने का प्रयास करना चाहिए।

इससे सुषुम्ना मार्ग कुण्डलिनी के लिए खुलता है। पूरक के समय ‘अकार’ का स्मरण करते हुए बारह बार ओम का जाप करें।

कुम्भक के समय ‘उकार’ का स्मरण करते हुए सोलह बार ओम का जाप करें और रेचक के समय “मकार’ का ध्यान करते हुए
दस बार ओम का जाप करें तब एक प्राणायाम पूर्ण होगा।

Benifits of Trividh Pranayama | त्रिविधि प्राणायाम के लाभ

जिस प्राणायाम में पसीना आता है, वह अधम है। जिसमें शरीर में कंपकंपी होती है, वह मध्यम है। और जिसमें शरीर ऊपर उठता है, वह उत्तम है।

अधम प्राणायाम से व्याधियों व पापों का नाश होता है । मध्यम से रोगों व महाव्याधियों का पापों सहित नाश होता है, और उत्तम प्राणायाम से साधक मिताहारी, अल्पमूत्र व अल्पमल वाला हो जाता है।

शरीर की लघुता (हल्कापन) व सत्त्वगुण प्राप्ति होती है। इन्द्रियां व बुद्धि तीव्र होकर साधक त्रिकालज्ञ हो जाता है। त्रिकालज्ञता कुण्डलिनी जागरण के बिना सम्भव नहीं होती, अत: कुण्डलिनी जागरण भी हो जाता है।

Kumbhaka Pranayama | कुम्भक प्राणायाम

कुम्भक प्राणायाम की सिद्धि के लिए प्रारम्भ में त्रिविधि प्राणायाम ही करना चाहिए। अभ्यास सिद्ध हो जाने पर शरीर के सभी द्वारों को बन्द करके कुम्भक प्राणायाम किया जाता है

जिसमे वायु को भीतर ही रोक कर उसे सुषुम्ना में चढ़ाया जाता है। उस समय सहस्त्रार चक्र में परमात्मा का ध्यान किया जाता है। यह अत्यंत श्रेष्ठ प्राणायाम है।

कुम्भक प्राणायाम ( के दो भेद ‘सहित’ व ‘केवल’ हैं। सहित कुम्भक पूरक से युक्त होता है। ऊपर के श्लोक में 9 द्वारों को रोककर वायुपान कर कुम्भक करने की विधि ‘ सहित कुम्भक प्राणायाम’ की कही गई है।

‘सहित कुम्भक ‘ में दक्षता प्राप्त हो जाने पर ही केवल कुम्भक करना चाहिए। ‘ केवल कुम्भक ‘ पूरक तथा रेचक के बिना होता है। अत: इसे ‘केवल ‘ कहा जाता है ।

इस प्राणायाम में श्वांस को फेफड़ों में भरे बिना अथवा बाहर निकाले बिना, जिस भी स्थिति में श्वांस है उसे जहां के तहां पर रोक दिया जाता है, और फिर उस रोके हुए वायु को सुघुम्ना में प्रेरित किया जाता है। इसे ‘ केवल कुम्भक ‘ कहते हैं।

“केवल कुम्भक’ कठिन प्राणायाम है। इसे शनै: शनै: क्रमश: त्रिविधि प्राणायाम व सहित कुम्भक में निपुणता प्राप्त करने के बाद ही आरम्भ करना चाहिए।

Vayu Nirodha | वायु निरोध

केवल कुम्भक’ वास्तव में वायुनिरोध से सम्बन्धित है । समस्त प्राणायामों में इसीलिए वायु निरोध का अभ्यास आवश्यक कहा गया है प्राणवायु की चंचलता मन व बिन्दु (वीर्य) को भी चंचल करती है।

किन्तु प्राणवायु को निश्चल करने से मन भी शांत तथा वीर्य भी स्थिर होता है। अत: वायु निरोध का अभ्यास उन के लिए भी उपयोगी है, जो कुण्डलिनी जागरण के मार्ग पर नहीं जाना चाहते हैं।

जो शरीर के अंगों को बलिष्ठ बनाने, छाती पर पत्थर तुड़ाने या ट्रक चढ़वा लेने, थाली को कागज की भांति चीर डालने आदि जैसे चमत्कार करना चाहते हैं

ऐसे चमत्कार वायु निरोध के अभ्यास से तथा शरीर के विशिष्ट भाग/अंग को प्राणवायु द्वारा दृढ़ कर लेने से ही संम्भव है।

आमतौर पर देखा जा सकता है, कि भरी वस्तु जब सामान्य रूप से नहीं उठाई या हिलाई जाती तब सांस रोक कर उसे उठाने या हिलाने में सफलता मिल जाती है।

यह वायु निरोध व प्राणों के केन्द्रीयकरण का एक अति सामान्य उदाहरण है। शरीर में जब तक वायु स्थित है, देह नहीं छूटती। वायु के शरीर से निकल जाने पर ही मरण होता है।

अतः प्राण वायु के निरोध का अभ्यास अवश्य करें। इससे चित्त भी स्वस्थ रहता है। वायुनिरोध के समय दृष्टि को भृकुटियों के मध्य रखकर ध्यान लगाया जाता है। इस अभ्यास की सिद्धि मृत्यु के भय से मुक्त करने वाली मानी गयी है।

Conclusion | सारांश

इनके अतिरिक्त अनेक प्राणायाम और भी हैं जिनसे भिन्‍न-भिन्‍न लाभ होते हैं। जैसे मौसम से शरीर की सुरक्षा के लिए। हिमालय आदि बर्फीले प्रदेशों में तप करने वाले योगियों को इस प्रकार के प्राणायामों की आवश्यकता पड़ जाती है।

धौंकनी की भांति शीघ्रातिशीघ्र श्वांस लेना व छोड़ना शरीर में गर्मी उत्पन्न करता है। इसे ‘ भस्त्रिका प्राणायाम’ कहते हैं।

अथवा भूख व प्यास के शमन के लिए किए जाने वाले प्राणायाम ( मुख खोलकर अधिकाधिक वायु को मुख में लेकर सटक कर पेट में उतारा जाता है) आदि।

कुछ प्राणायाम ऐसे भी है, जिनमें नासिका की बजाए मुख या जिह्म का उपयोग किया जाता है और वायु कोजिह्म द्वारा ग्रहण किया जाता है।

काकीमुद्रा में प्राणों का आयाम न करके प्राण वायु का पान किया जाता है। उस समय जीभ को कौए की चोंच के समान अर्धगोलाकार/नालीदार बना लिया जाता है

अत: इसे “काकी मुद्रा” कहा जाता है। वृद्धावस्था को रोकने के लिए यह अत्यंत उपयोगी कहा गया है।

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